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समय के अनुकूल हो शिक्षा

देश की वर्तमान व भविष्य में आने वाली परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये हमें अपनी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने की अति आवश्यकता है। हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो समय के अनुकूल हो। हमारी दुर्दशा का मूल कारण वह नकारात्मक शिक्षा प्रणाली है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल क्लर्क पैदा करने की मशीनरी मात्र है, यदि केवल यह इसी प्रकार की होती है तो भी मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ। किन्तु इस दूषित शिक्षा प्रणाली द्वारा शिक्षित भारतीय युवक अपने पिता, अपने पूर्वजों, अपने इतिहास एवं अपनी संस्कृति से घृणा करना सीखता है। यहाँ तक की पवित्र वेदों, पवित्र गीता को थोथा एवं झूठा समझने लगता है।

अपने अतीत, अपनी संस्कृति पर गौरव करने के बदले वह उनसे घृणा करने लगता है और विदेशियों की नकल करने में ही गौरव का दुष्प्रभाव करता है। कई वर्षों की इस दूषित शिक्षा प्रणाली का दुष्प्रभाव स्पष्ट दिखता है कि यह शिक्षा एक भी यथार्थ व्यक्त्तिव के निर्माण में सफल नहीं रही है। ऐसी शिक्षा का महत्व ही क्या जो हमें केवल परतन्त्र बनने का मार्ग दिखाती है। जो हमारे गौरव, स्वावलंबन एवं आत्म-विश्वास का हरन करती है। जिसे पाकर हम स्वतन्त्र रूप से कुछ भी करने में असमर्थ रहते हैं।

जिसे पाकर हमें नौकरियों के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। बी.ए., एम.ए., बी.एस.सी, इंजिनियरिंग व मास्टर डिग्री तक प्राप्त करने के बाद भी युवक स्वतन्त्र रूप से अपनी आजीविका नहीं कमा सकता। कुछ परीक्षायें पास कर लेना या धुआंधार व्याख्यान देने की शक्ति प्राप्त कर लेना ही शिक्षित हो जाना नहीं कहलाता। शिक्षा वह है जिसके बल से लोगों को जीवन संग्राम के लिए समर्थ किया जा सके। पोथियाँ पढ़ लेना शिक्षा नहीं है। न ही अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने का नाम शिक्षा है।

शिक्षा तो वह है जिसकी सहायता से इच्छा शक्ति का वेग और स्फूर्ति अपने वश में हो जाये और जिससे अपने जीवन के उद्देश्य पूर्ण हो सकें। शिक्षा का मतलब अपने दिमाग में सूचनाओं एवं जानकारियों को भरना नहीं है। बल्कि जानकारियों को सही उपयोग करना ही शिक्षा है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को व्यावहारिक बनाना है। जो शिक्षा व्यावहारिक नहीं है वह व्यर्थ है।

कुछ शब्दों को पढ़ लिखना शिक्षा नहीं है। शिक्षा का मतलब व्यक्तियों को इस तरह से संगठित करने से है जिससे उनके विचार अच्छाई, व लोगों की भलाई के लिए दौड़े और वे अपने कार्य को पूर्ण कर सकें। वर्तमान शिक्षा हमें चरित्र-बल, आत्म-विश्वास, संघर्ष-शक्ति और सिंह के समान सहास प्रदान करने में असमर्थ हैं। -स्वामी विवेकानन्द.

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