अगस्त 2026 से जनवरी 2027 तक विद्यालयों में प्रतिदिन 20 से 30 मिनट का विशेष कैच-अप शिक्षण सत्र आयोजित होगा।
लखनऊ। प्रदेश सरकार शिक्षा सुधार के अगले चरण में प्रवेश करते हुए अब विद्यार्थियों के सीखने के अंतराल (लर्निंग गैप) को समाप्त करने के लिए प्रदेशव्यापी कैच-अप शिक्षण अभियान शुरू करने जा रही है। इस पहल का उद्देश्य उन बच्चों तक प्रभावी शैक्षणिक सहायता पहुंचाना है, जो किसी कारणवश अपेक्षित अधिगम स्तर से पीछे रह गए हैं।इस अभियान के तहत जुलाई 2026 में सभी विद्यार्थियों के लिए 15 दिवसीय पुनरावृत्ति शिक्षण कार्यक्रम संचालित किया जाएगा। इसके बाद अगस्त 2026 से जनवरी 2027 तक विद्यालयों में प्रतिदिन 20 से 30 मिनट का विशेष कैच-अप शिक्षण सत्र आयोजित होगा।
कार्यक्रम का उद्देश्य प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी आवश्यकता के अनुरूप शैक्षणिक सहयोग प्रदान करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और एनसीएफएसई-2023 के अनुरूप तैयार की गई इस कार्ययोजना के माध्यम से सरकार बच्चों के अधिगम स्तर में सुधार लाने के लिए सुनियोजित और परिणामोन्मुखी रणनीति लागू करेगी। सरकार का मानना है कि समय रहते लर्निंग गैप को दूर करना बच्चों की आगे की शैक्षणिक प्रगति के लिए आवश्यक है। उत्तर प्रदेश में शिक्षा सुधार अब केवल नामांकन और आधारभूत सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के वास्तविक अधिगम परिणामों पर भी केंद्रित है।
निपुण भारत मिशन, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल अनुश्रवण और अब कैच-अप शिक्षण अभियान के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई भी बच्चा सीखने की प्रक्रिया में पीछे न रह जाए। कैच-अप शिक्षण को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर स्थानीय परिवेश, दैनिक जीवन के अनुभवों और गतिविधि आधारित शिक्षण से जोड़ा जाएगा। शिक्षण-अधिगम सामग्री (टीएलएम), गणित किट, पुस्तकालय की पुस्तकें, चार्ट, पोस्टर और स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया जाएगा।
खेल आधारित गतिविधियां, कहानी, चित्र, लेखन, समूह कार्य और सहभागितापूर्ण शिक्षण के माध्यम से बच्चों की सीखने में रुचि बढ़ाई जाएगी, जिससे वे विषयों को बेहतर ढंग से समझ सकें। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों की सीखने संबंधी कठिनाइयों की पहचान कर उनका समाधान किया जाएगा। त्रुटि विश्लेषण के माध्यम से यह समझा जाएगा कि बच्चे किन कारणों से पिछड़ रहे हैं। मैं करूं-हम करें-तुम करो रणनीति, पीयर लर्निंग, पेयर लर्निंग और कोआॅपरेटिव लर्निंग जैसी शिक्षण पद्धतियों का उपयोग कर विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, सहयोग और समस्या समाधान क्षमता विकसित की जाएगी। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी बच्चा स्वयं को कमजोर या उपेक्षित महसूस न करे।





