लखनऊ। हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को बेहद पवित्र और प्रभावशाली दिन माना जाता है, लेकिन जून में पड़ने वाली अमावस्या बेहद खास मानी जा रही है. क्योंकि इस दिन एक साथ कई संयोग बन रहे हैं। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है, जिसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा इस वर्ष की पहली सोमवती अमावस्या अधिक मास में पड़ रही है, जो इसे और भी विशेष बना रही है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा पूर्वक पूजा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। साथ ही, यह दिन पितरों के तर्पण और श्राद्ध के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। अधिक मास के कारण इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। पंचांग के अनुसार, इस बार सोमवती अमावस्या अधिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ रही है। अमावस्या तिथि की शुरूआत 14 जून, रविवार को दोपहर 12:20 बजे से होगी और इसका समापन 15 जून, सोमवार को सुबह 8:24 बजे होगा। उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए 15 जून को सोमवती अमावस्या का व्रत रखा जाएगा और स्नान-दान किया जाएगा, जबकि पितृ कार्यों के लिए 14 जून का दिन अधिक उपयुक्त माना गया है।
सोमवती अमावस्या का महत्व
इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं और भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा करती हैं। साथ ही पीपल के वृक्ष की पूजा और उसकी परिक्रमा करने की परंपरा भी है। मान्यता है कि अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान और दान करने से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है। इसके अलावा, इस दिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध करने से पितृ दोष शांत होता है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और दिन की शुरूआत पवित्रता के साथ करें। भगवान शिव का अभिषेक करें और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करें। पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध अवश्य करें। जरूरतमंदों को दान देकर पुण्य अर्जित करें। तामसिक भोजन से दूर रहें और किसी का अपमान करने से बचें।
3 चीजों का दान करने से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को पितरों की शांति, तर्पण और दान-पुण्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। वर्ष 2026 में यह तिथि और भी विशेष बनने जा रही है, क्योंकि 15 जून को ज्येष्ठ अधिकमास अमावस्या और सोमवती अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसे शुभ अवसर बहुत कम देखने को मिलते हैं और इस दिन किए गए स्नान, दान तथा पितृ तर्पण का कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस विशेष योग में पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने और पितृ दोष से राहत पाने के लिए किए गए धार्मिक कार्य अत्यंत फलदायी सिद्ध होते हैं। खासकर दान-पुण्य और पूर्वजों के निमित्त किए गए उपाय जीवन में सुख, शांति और समृद्धि के मार्ग खोल सकते हैं।
काले तिल और तांबे का दान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ कार्यों में काले तिल का विशेष महत्व माना गया है। सोमवती अमावस्या के दिन तांबे के पात्र में जल, काले तिल, गंगाजल और थोड़ा कच्चा दूध मिलाकर पीपल के वृक्ष की जड़ में अर्पित करना शुभ माना जाता है। जल अर्पित करते समय पितरों का स्मरण करें और इसके बाद तांबे की कोई वस्तु दान करें। मान्यता है कि इससे पितृ दोष के प्रभाव कम होते हैं और जीवन में आ रही कई बाधाओं से राहत मिल सकती है।
छाता, चप्पल और अन्न का दान
ज्येष्ठ मास की गर्मी को ध्यान में रखते हुए इस दिन जरूरतमंद लोगों को छाता, चप्पल या सात प्रकार के अनाज का दान करना पुण्यकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसे दान से पूर्वजों की आत्मा को संतुष्टि मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बढ़ने की मान्यता भी है।
पीपल के पास दीपदान और मिष्ठान अर्पण
अमावस्या की संध्या में पीपल के वृक्ष के पास घी का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके साथ सफेद रंग की मिठाई या खीर जैसी वस्तु पितरों का स्मरण करते हुए अर्पित की जा सकती है। मान्यता है कि यह उपाय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम बनता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। धार्मिक विश्वासों के अनुसार, इससे आर्थिक बाधाएं दूर होने और पारिवारिक सुख-समृद्धि बढ़ने के योग बनते हैं।





