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श्री रामकृष्ण ने जगत जननी मां से ज्ञान प्राप्त किया :स्वामी मुक्तिनाथानंद

सच्चा ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं बल्कि आत्मानुभूति से प्राप्त होता है – स्वामी जी
लखनऊ। रविवार के प्रात: कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि भगवान श्री रामकृष्ण परमहंस भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के ऐसे महान संत थे, जिनका ज्ञान केवल पुस्तकों या औपचारिक शिक्षा पर आधारित नहीं था, बल्कि उनकी ईश्वर के प्रति गहन साधना और प्रत्यक्ष दिव्य अनुभूति का परिणाम था। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह सिद्ध किया कि सच्चा ज्ञान अनुभव से प्राप्त होता है और ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं।
श्री रामकृष्ण का मानना था कि ईश्वर को केवल शास्त्र पढ़कर नहीं जाना जा सकता, बल्कि उनके दर्शन और अनुभूति के द्वारा ही वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। वे कहते थे कि जब तक मनुष्य स्वयं ईश्वर का अनुभव नहीं करता, तब तक उसका ज्ञान अधूरा रहता है। इसलिए उन्होंने आध्यात्मिक जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव को सर्वोच्च स्थान दिया। दक्षिणेश्वर में कठोर साधना के दौरान उन्होंने मां काली से प्रार्थना की कि वे उन्हें ईश्वर तक पहुंचने वाले सभी मार्गों का अनुभव कराएं। उनकी इस प्रार्थना के फलस्वरूप उन्होंने कर्मयोग, भक्तियोग, योग साधना और ज्ञानयोग जैसे विभिन्न मार्गों का अभ्यास किया। प्रत्येक मार्ग से उन्हें एक ही परम सत्य की अनुभूति हुई। इससे उन्होंने यह संदेश दिया कि अलग-अलग साधनाएं और मत अंतत: एक ही परमात्मा तक पहुंचने के साधन हैं। स्वामी जी ने बताया कि श्री रामकृष्ण का प्रसिद्ध संदेश था—”जितने मत, उतने पथ। इसका अर्थ है कि संसार में विभिन्न धर्म, विचारधाराएँ और उपासना पद्धतियाँ हो सकती हैं, परंतु उनका अंतिम लक्ष्य एक ही ईश्वर की प्राप्ति है। उनका यह विचार धार्मिक सहिष्णुता, प्रेम और आपसी सम्मान की भावना को मजबूत करता है तथा समाज में एकता का संदेश देता है। उन्होंने यह भी बताया कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है। यहां मिथ्या का अर्थ यह नहीं कि संसार का अस्तित्व ही नहीं है, बल्कि यह कि संसार परिवर्तनशील और नश्वर है, जबकि ब्रह्म ही शाश्वत और अपरिवर्तनीय सत्य है। मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसी ब्रह्म का अंश है और आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य उसी सत्य का बोध करना है। श्री रामकृष्ण का संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए सच्ची श्रद्धा, प्रेम, भक्ति और आत्मसमर्पण आवश्यक हैं। उनका ज्ञान किसी ग्रंथ तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रत्यक्ष दिव्य अनुभूति पर आधारित था। यही कारण है कि उनके वचनों में गहराई, सरलता और आध्यात्मिक शक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि भगवान श्री रामकृष्ण का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्चा ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि आत्मानुभूति, साधना और ईश्वर के प्रति समर्पण से प्राप्त होता है। उनके विचार आज भी मानवता को प्रेम, सद्भाव, आध्यात्मिक जागृति और सार्वभौमिक एकता का मार्ग दिखाते हैं।

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