लखनऊ। कथक के लखनऊ घराने को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाले महान कथकाचार्य पंडित लच्छू महाराज की 19 जुलाई को पुण्यतिथि है। उनके जाने के दशकों बाद भी राजधानी की सांस्कृतिक फिजा में उनकी विरासत जीवंत है। कथक की जब भी बात होती है, लखनऊ का नाम और लच्छू महाराज की साधना साथ-साथ याद की जाती है।
कथक के लखनऊ घराने को जिस नाम ने पहचान दिलाई ऐसे कालिका महाराज के तीन पुत्रों में से बीच के बैजनाथ प्रसाद मिश्र ही आज लच्छू महाराज के नाम से विख्यात हैं। कहते हैं, इनके ताऊ बिंदादीन महाराज ने अपने तीनों भतीजों अच्छन महाराज, लच्छू महाराज और शंभू महाराज को गंडा बांधकर नृत्य की शिक्षा दी थी। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में बिंदादीन महाराज का निधन हो जाने के कारण परिवार का पूरा दायित्व अच्छन महाराज पर आ गया। यही समय था जब अच्छन महाराज को रामपुर नवाब का आमंत्रण मिला। वो अपने दोनों छोटे भाइयों को लेकर रामपुर चले गए और यहां नवाब हामिद अली साहब के दरबारी नर्तक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। महफिल में गुणीजन की उपस्थिति में लच्छू महाराज नवाब साहब के बाजू में बैठते तो गर्वित महसूस करते। लच्छू महाराज की युवावस्था का एक लंबा समय नवाबी माहौल में गुजरा। यही कारण रहा कि महाराज जी अपने जीवन के अंतिम काल तक नवाबी ठाठ-बाट में ही जिये।
पंडित लच्छू महाराज का जन्म लखनऊ में हुआ और यहीं से उन्होंने कथक की बारीकियों को आत्मसात किया। उन्होंने लखनऊ घराने की नजाकत, भावाभिनय और अदाओं को ऐसा विस्तार दिया कि यह शैली देश ही नहीं, दुनिया भर में पहचानी जाने लगी। फिल्मी दुनिया में सफलता हासिल करने के बाद भी उनका मन अपनी जन्मभूमि लखनऊ में ही रमा रहा। उत्तर प्रदेश सरकार के कथक केंद्र से जुड़कर नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देना शुरू किया। उन्होंने कथक को केवल नृत्य नहीं, बल्कि अनुशासन, अभिव्यक्ति और भारतीय संस्कृति का माध्यम माना। लखनऊ में उनके अनेक शिष्यों ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया। वरिष्ठ कथक गुरु कुमकुम धर उनकी प्रमुख शिष्याओं में हैं।
कथक केंद्र के संस्थापक निदेशक भी थे
लखनऊ में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित कथक केंद्र के संस्थापक निदेशक भी थे । उन्होंने कई प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते, जिनमें राष्ट्रपति पुरस्कार और 1957 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार शामिल है , जो प्रदर्शन कलाकारों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार है, जिसे संगीत नाटक अकादमी , भारत की राष्ट्रीय संगीत, नृत्य और नाटक अकादमी द्वारा प्रदान किया जाता है।
आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेगी
पंडित बिरजू महाराज कथक केन्द्र की अध्यक्ष कुमकुम धर ने कहा कि पंडित लच्छू महाराज केवल मेरे गुरु ही नहीं, बल्कि कथक की एक जीवंत परंपरा थे। उन्होंने हमें सिखाया कि कथक सिर्फ कदमों की गति नहीं, बल्कि भाव, संवेदना और आत्मा की अभिव्यक्ति है। उनके साथ बिताया हर पल आज भी मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। गुरुजी की सादगी, अनुशासन और कला के प्रति समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणा है। आज भी जब मैं अपने शिष्यों को कथक सिखाती हूं, तो उनके बताए हुए सिद्धांत और शैली को आगे बढ़ाने का प्रयास करती हूं। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन देती रहेगी। उन्होंने कहा कि लखनऊ की मिट्टी में आज भी पंडित लच्छू महाराज के घुंघरुओं की गूंज हैं। वरिष्ठ नृत्यांगना कुमकुम धर ने कहा कि पंडित लच्छू महाराज ने कथक को मंचीय प्रस्तुति से आगे बढ़ाकर भाव, अभिनय और सौंदर्य का ऐसा स्वरूप दिया, जिसकी छाप आज भी लखनऊ घराने की हर प्रस्तुति में दिखाई देती है। उनकी शैली में नजाकत, ठहराव और भावों की गहराई आज भी कलाकारों के लिए आदर्श मानी जाती है।





