लखनऊ। नाग पंचमी हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसे हर वर्ष सावन मास में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस दिन नाग देवताओं की पूजा की जाती है और उन्हें दूध अर्पित किया जाता है। आमतौर पर यह पर्व हरियाली तीज के लगभग दो दिन बाद पड़ता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नागों की विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और परिवार को सर्पदंश के भय से सुरक्षा मिलती है। इस अवसर पर विशेष रूप से 12 प्रमुख नागों की आराधना की जाती है, अनन्त, वासुकी, शेष, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, अश्वतर, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालिया, तक्षक और पिंगल। वर्ष 2026 में नाग पंचमी 17 अगस्त को मनाई जाएगी। इस दिन पूजा का शुभ समय सुबह 05:51 बजे से 08:29 बजे तक रहेगा। पंचमी तिथि 16 अगस्त 2026 को शाम 04:52 बजे से आरंभ होकर 17 अगस्त 2026 को शाम 05:00 बजे तक रहेगी। नाग पंचमी के मौके लोग भगवान शिव के मंदिर में जाकर नाग देवता को दूध अर्पण करते हैं। इसके अलावा कुछ लोग मिट्टी से निर्मित सांपों की भी पूजा करते हैं, उन्हें अलग-अलग रंगों में रंगकर सुंदर-सुंदर रूप और आकार देते हैं। नाग देवता की इस प्रतिमा को एक आसन पर रखा जाता है और दूध अर्पित किया जाता है।
नाग पंचमी की पूजा का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार नाग देवता की पूजा के लिए अत्यंत ही शुभ माने जाने वाली श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पंचमी इस साल 16 अगस्त 2026, रविवार की शाम को 04:52 बजे प्रारंभ होकर अगले दिन 17 अगस्त 2026 को सायंकाल 05:00 बजे तक रहेगी. ऐसे में उदया तिथि के आधार पर नाग पंचमी का पावन पर्व 17 अगस्त, 2026 सोमवार को मनाया जाएगा. हिंदू मान्यता के अनुसार सोमवार के दिन यह पावन पंचमी पड़ने पर और भी ज्यादा शुभ और फलदायी हो गई है. पंचांग के अनुसार नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त 17 अगस्त को प्रात:काल 05:51 से लेकर 08:29 बजे तक रहेगा।
नाग पंचमी का महत्व
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि, घर के प्रवेश द्वारा के दोनों ओर नाग के चित्र बनाकर उनकी पूजा करना शुभ माना जाता है। इसे भित्ती चित्र नाग पूजा भी कहा जाता है। हिंदू महिलाओं को इस दिन ब्राह्मणों को लड्डू और खीर जैसे मिष्ठान का भोजन कराना चाहिए। इसके अलावा शिव मंदिर में सांपों को दूध अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।
नाग पंचमी पूजा विधि
नाग पंचमी के दिन प्रात:काल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद भगवान शिव के साथ नाग देवता की भी श्रद्धापूर्वक पूजा करें। पूजा स्थल पर नाग देवता की तस्वीर स्थापित करें या मिट्टी से उनका स्वरूप बनाएं। नाग देवता की प्रतिमा को लाल कपड़े पर स्थापित करें। इसके बाद हल्दी, रोली, अक्षत, कच्चा दूध और पुष्प अर्पित करें। तांबे के पात्र से जल और दूध अर्पित कर अभिषेक करें। यदि संभव हो, तो इस दिन रुद्राभिषेक कराना शुभ माना जाता है। साथ ही मंदिर में चांदी के नाग-नागिन के जोड़े का दान करना भी पुण्यदायी माना जाता है।
नाग पंचमी की कथा
नाग पंचमी की कथा महाभारत के राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ से जुड़ी है। तक्षक नाग के काटने से अपने पिता सम्राट परीक्षित की मौत का बदला लेने के लिए जनमेजय ने दुनिया के समस्य सर्पों के अंत हेतु एक विशाल सांप यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के शक्तिशाली मंत्रों की वजह से अनगिनत सांप अग्नि कुंड में समाने लगे। तब नागों की रक्षा के लिए देवी मनसा के पुत्र, युवा ऋषि आस्तिक ने जनमेजय को यज्ञ रोकने का अनुरोध किया। एक ब्राह्माण के आग्रह करने पर राजा ने यज्ञ को समाप्त कर दिया। श्रावण मास के पांचवे दिन नागों के प्राण बचे थे, तभी से इस दिन को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है।





