यह प्रसंग जिंदगी की कड़वी सच्चाई को बताने के साथ झकझोर भी जाता है
लखनऊ। पिछले महीने देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान की थी। अदालत ने 12 साल से अधिक समय से कोमा में चल रहे 32 वर्षीय हरीश राणा का लाइफ सपोर्ट (जीवनरक्षक मशीनें) हटाने की मंजूरी प्रदान की थी। गाजियाबाद के हरीश को नली के जरिए दवाएं, भोजन और पानी दिया जाता था। यह निर्णय उन परिवारों की पीड़ा का भी परिचायक था, जो अपने प्रियजनों को ऐसी अवस्था में देखते हुए कठिन निर्णयों से गुजरते हैं। आज सिनेमाघरों में रिलीज हो रही फिल्म मर्सी भी किसी व्यक्ति की असहनीय पीड़ा को खत्म करने के लिए उसके जीवन मुक्ति पर आधारित है। कहानी अमेरिका से मुंबई आए इंजीनियर शेखर (राज वासुदेव) के इर्दगिर्द है। शेखर और उसके छोटे भाई विहान (कुणाल भान) का पालन पोषण उनकी मां सुजाता (अर्पणा घोषाल) ने अकेले ही किया होता है। विहान जब मां के गर्भ में था तभी पिता का निधन हो जाता है। पूरा परिवार खाने पर एकत्र होता है। इस दौरान विहान अपना म्यूजिकल बैंड शुरू करने की चाहत व्यक्त करता है। उसके लिए शेखर से आर्थिक मदद मांगता है, लेकिन वह इनकार कर देता है। दरअसल, विहान उससे पहले कई बार असफल हो चुका होता है। इसी दौरान शेखर की पत्नी जिया (निहारिका रायजादा) गर्भवती होने की खुशखबरी देती है। इसके बाद घटनाक्रम मोड़ लेते हैं। छह महीने से सुजाता कोमा में है। डॉक्टर भी उम्मीद छोड़ चुके हैं। शेखर असमंजस में है, जबकि जिया और विहान को लगता है कि वेंटिलेटर पर मां को रखना उसके कष्ट को बढ़ाना ही है। अंतत: फादर (आदिल हुसैन) के मार्गदर्शन के बाद शेखरअहम फैसला लेता है। फिल्म के लेखक और निर्देशक मितुल पटेल ने अत्यंत गंभीर और संवेदनशील विषय को बिना नाटकीयता और भाषणबाजी के दशार्ने की कोशिश की है। उन्होंने उसे बोझिल नहीं बनने दिया है। असमंजस में फंसे शेखर को जब फादर एक बुजुर्ग दंपती की कहानी सुनाते हैं कि किस प्रकार यही प्रेम बाद में नफरत में भी बदल जाता है। वह दिल को छूता है। यह प्रसंग जिंदगी की कड़वी सच्चाई को बताने के साथ झकझोर भी जाता है। इसी तरह मां को वेंटिलेटर से हटाने को लेकर भाइयों के बीच टकराव और खर्च को लेकर चिंता जैसे दृश्य वास्तविक लगते हैं। अच्छी बात यह है कि 146 मिनट अवधि की यह फिल्म अपने मूल विषय पर ही केंद्रित रहती है। कलाकारों में शेखर के द्वंद्व, संवेदनशीलता और जिद को राज वासुदेव ने बहुत सहजता से निभाया है। कुणाल भान ने भी अपने पात्र के साथ न्याय किया है। जिया की भूमिका में निहारिका रायजादा के हिस्से में सीमित, लेकिन अहम दृश्य हैं। मां की भूमिका में अपर्णा घोषाल जरूरी भाव लाती हैं। आदिल हुसैन संक्षिप्त भूमिका में हैं, लेकिन गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं। कुल मिलाकर कुछ कमियों के बावजूद ‘मर्सी’ इंसान को लंबी पीड़ा से मुक्ति दिलाने जैसे कठिन विषय को सादगी से बिना शोरशराबे के उठाती है। यह सोचने पर मजबूर करती है।
कलाकार – राज वासुदेव, निहारिका रायजादा, अपर्णा घोषाल
निर्देशक – मितुल पटेल
रेटिंग-3/5





