लखनऊ। हिंदू पंचांग का तीसरा ज्येष्ठ माह इस वर्ष 59 दिनों का है। इसका कारण तीन वर्ष में एक बार आने वाले भगवान विष्णु का प्रिय अधिकमास के साथ इसका संयोग होना है। इसके चलते ज्येष्ठ माह 2 मई से शुरू होकर 29 जून तक रहेगा। इसके बीच 17 मई से 15 जून तक का समय ज्येष्ठ अधिकमास कहलाएगा। इससे पहले 2023 में श्रावण अधिकमास आया था। अधिकमास के चलते मई के बाद आने वाले 2026 के तीज-त्योहार भी 15 से 20 दिन आगे खिसक गए हैं। मान्यता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक अनुष्ठान का फल कई गुना प्राप्त होता है। इसके चलते इस दौरान मठ-मंदिर और आश्रम में कई आयोजन होंगे। अन्नपूर्णा मंदिर, गीता भवन, इस्कॉन मंदिर में इस अवसर पर विभिन्न आयोजन होंगे। साथ ही इसकी तैयारियां विभिन्न संगठनों द्वारा भी व्यापक स्तर पर की जा रही हैं। ज्योतिर्विद् विनायक चतुवेर्दी के अनुसार, हिंदू पंचांग में अधिकमास का विशेष महत्व है। इस माह को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि वर्ष 2026 के 11 वर्षों बाद 2037 में फिर से ज्येष्ठ अधिक मास होने का संयोग पड़ेगा। इसके पहले वर्ष 1999 में मई-जून माह में ज्येष्ठ अधिकमास पड़ा था। मतलब यह ज्येष्ठ माह 27 वर्षों के बाद आया है।
त्योहारों में देरी
ज्येष्ठ माह के कारण मई से दिसंबर के बीच होने वाले पर्व त्योहारों में पिछले वर्ष की तुलना में देर होगी। पिछले वर्ष रक्षाबंधन अगस्त के दूसरे सप्ताह में हुआ था इस वर्ष यह अगस्त के अंतिम सप्ताह में पड़ रहा है। जन्माष्टमी पिछले साल 16 अगस्त को मनाया गया था। इस वर्ष यह 4 सितंबर को होगा। इस वर्ष दिपावली अक्टूबर की जगह नवंबर माह में मनाया जाएगा।
पंचांग की गणना और अधिकमास का विज्ञान
ऐसा संयोग तीन वर्ष के बाद बनता है। यह माह अचानक प्रारंभ नहीं होता बल्कि पंचांग की गणना के अनुसार जुड़ता है। सौर वर्ष में लगभग 365 जबकि चंद्र वर्ष में करीब 354 दिन होते हैं। इस तरह हर साल 11 दिनों का अंतर बन जाता है। यह अंतर धीरे-धीरे बढ़ते हुए करीब 32 महीने 16 दिन में एक महीने के बराबर हो जाता है। तब पंचांग का एक महीना जोड़ा जाता है। इस अतिरिक्त महीने को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।
मलमासी जेठ में पड़ेगी दो पूर्णिमा, दो अमावस्या
लखनऊ। भगवान विष्णु को समर्पित अधिमास तो हर चौथे साल आता है लेकिन जेठ में अबकी 27 साल बाद आ रहा है। इसके चलते जेठ के दो महीने होंगे। पहले महीने का पहला पखवाड़ा बीतने के बाद दूसरे जेठ का आगमन 17 मई को होगा। 15 जून को इसके प्रस्थान के बाद पहले जेठ का दूसरा पखवाड़ा आरंभ होगा। दो पूर्णिमा, दो अमावस्या के साथ ही मलमासी जेठ में गुरुपुष्य योग भी दो बार बनेगा। एक योग मई के अंत और दूसरा जून के पहले सप्ताह में बनेगा। आदर्श सेवा संस्कृत कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार सनातनी पंचांगों की गणना संतुलित करने के लिए अधिमास की व्यवस्था है। सूर्य वर्ष करीब 365 दिनों का जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है। यही अंतर तीन वर्ष में करीब एक महीने हो जाता है। सूर्य और चंद्र वर्ष के इस अंतर को समाप्त करने के लिए हर 32 महीने 16 दिन में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। यही अतिरिक्त महीना अधिक मास, मलमास और पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। अधिमास में सूर्य एक से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करते। ऐसी स्थिति में यह महीना धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाता है किंतु मांगलिक कार्यों पर अल्पविराम लग जाता है। अधिक मास को शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। इस दौरान शादी-विवाह से जीवन में परेशानियां बढ़ सकती हैं। नए घर में प्रवेश, नींव पूजन या प्रॉपर्टी से जुड़े बड़े फैसले भी इसमें नहीं लेने चाहिए। जनेऊ संस्कार, सगाई, मुंडन आदि भी वर्जित है। नया कारोबार, दुकान या शोरूम खोलने से आर्थिक क्षति की आशंका रहती है। कुल मिलाकर हमारे ग्रंथ इस समय बड़े फैसलों और नई शुरूआत से बचने की सलाह देते हैं। अधिमास में तामसिक भोजन से हर हाल में बचना चाहिए।
अधिमास में दान-पुण्य का विशेष महत्व
ज्योतिषाचार्य पं. विकास शास्त्री के अनुसार अधिमास में दान-पुण्य का विशेष महत्व है। हर व्यक्ति को जरूरतमंद लोगों को अनाज, जल, तिल, वस्त्र और फल का दान अनिवार्य रूप से करना चाहिए। पवित्र जल में स्नान करने से पूर्व घर पर स्नान करके ही जाना उत्तम कहा गया है। यदि जल स्थान तक न जा सकें तो सामान्य जल में गंगाजल मिला कर स्नान करने से भी गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त होगा। इस अवधि को भक्ति, साधना और आत्मचिंतन में लगाना श्रेष्ठ माना गया है। भगवत कृपा पाने का यह विशेष अवसर होता है।





