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ज्येष्ठ प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत आज, बप्पा की होगी पूजा

सुख, समृद्धि, सन्तति तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है
लखनऊ। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी का व्रत किया जाएगा। इस बार 18 जून गुरुवार को है। यह व्रत गृहस्थों के लिये विशेष कल्याणकारी बताया गया है। व्रत में संयम, श्रद्धा एवं पूर्ण भक्ति के साथ गणेश पूजन करने से पारिवारिक सुख, समृद्धि, सन्तति तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 17 जून 2026 रात 9.38 पर शुरू होगी और अगले दिन शाम 6.58 तक रहेगी। इस दिन पूजा मध्याह्र काल में रखी जाएगी। हिंदू धर्म में प्रत्येक माह की शुक्ल और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी (विनायक) गणेश चतुर्थी और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस प्रकार सामान्य वर्ष में कुल 24 चतुर्थी व्रत होते हैं, जिनमें 12 विनायकी और 12 संकष्टी चतुर्थी शामिल होती हैं। प्रत्येक चतुर्थी का अपना अलग नाम, कथा और धार्मिक महत्व होता है, और ये व्रत मुख्य रूप से भगवान श्री गणेश को समर्पित होते हैं। जून के महिने में पड़ने वाले चतुर्थी को प्रद्युम्न चतुर्थी कहा जाएगा।

प्रद्युम्न चतुर्थी महत्व
पुराणों के अनुसार प्रद्युम्न चतुर्थी के दिन गणेश पूजा से कार्यों में आने वाली रुकावटें कम होती हैं और नए कार्यों में सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। भगवान गणेश को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना गया है, इसलिए विद्यार्थी और कार्यक्षेत्र से जुड़े लोग भी विशेष पूजा करते हैं। बप्पा की आराधना से सुख-समृद्धि की कभी कमी नहीं रहती है. जीवन खुशहाल रहता है। मान्यता है कि इससे जीवन की बाधाएं कम होती हैं। भगवान गणेश को मोदक अत्यंत प्रिय माने गए हैं। पूजा के समय मोदक, बेसन या बूंदी के लड्डू का भोग लगाकर परिवार में प्रसाद वितरित करें। विनायक चतुर्थी पर गणेश मंत्र जप को शुभ माना गया है. ॐ गं गणपतये नम:॥ इस मंत्र का श्रद्धानुसार 11, 21 या 108 बार जप किया जाता है। गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ गणेश उपासना में महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे बुद्धि, सफलता और विघ्न निवारण से जोड़ा जाता है। क्षमता अनुसार अन्न, वस्त्र या मीठे पदार्थों का दान शुभ माना जाता है। गणपति को विघ्नहर्ता माना गया है, इसलिए इस दिन शुभ संकल्प या नए कार्य का आरंभ भी किया जाता है।

प्रद्युम्न चतुर्थी की पूजा विधि
प्रद्युम्न चतुर्थी के दिन प्रात:काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें. इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर को स्वच्छ चौकी पर स्थापित करें तथा दीप प्रज्वलित करें। भगवान गणेश को लाल चंदन का तिलक लगाएं, अक्षत अर्पित करें और उनकी प्रिय दूर्वा अवश्य चढ़ाएं, इसके बाद मोदक, लड्डू या अन्य प्रिय नैवेद्य का भोग लगाएं। पूजा के दौरान ॐ गं गणपतये नम: मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें और प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में कपूर या दीपक से भगवान गणेश की आरती करें तथा उनके समक्ष अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता है कि इस विधि से पूजा करने पर भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं।

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