यह सीरीज 1978 के कुख्यात रंगा-बिल्ला केस से प्रेरित है
लखनऊ। ओटीटी पर क्राइम थ्रिलर की भरमार है। लगभग हर दूसरे हफ्ते कोई नई मर्डर मिस्ट्री, कोई नया सीरियल किलर या कोई नई पुलिस जांच स्क्रीन पर आ जाती है। ऐसे में किसी नई क्राइम सीरीज का ध्यान खींचना आसान नहीं होता। राख यहां थोड़ा अलग रास्ता चुनती है।
यह सीरीज 1978 के कुख्यात रंगा-बिल्ला केस से प्रेरित है, जिसे भारत के सबसे खौफनाक अपराधों में गिना जाता है। इस केस पर पहले क्राइम पेट्रोल, भंवर और हाल में ब्लैक वारंट जैसे प्रोजेक्ट्स में अलग-अलग तरीके से बात हो चुकी है। लेकिन राख सिर्फ यह नहीं दिखाती कि अपराध हुआ कैसे? यह उस डर को पकड़ने की कोशिश करती है, जो ऐसे अपराध पूरे समाज में छोड़ जाते हैं। परी और पाताल लोक जैसी डार्क दुनिया रच चुके प्रोसित रॉय यहां भी वही बेचैनी पैदा करते हैं। हालांकि सवाल यह है कि क्या आठ एपिसोड तक यह सीरीज उसी पकड़ के साथ चलती रहती है? कहानी शुरू होती है दिल्ली के एक हाई प्रोफाइल परिवार से। मोना अरोड़ा (सोनाली बेंद्रे) और उनके पति अशोक अरोड़ा (आमिर बशीर) के दो बच्चे सुमन और साहिल एक रेडियो स्टेशन के प्रोग्राम में हिस्सा लेने घर से निकलते हैं, मगर वापस नहीं लौटते। कुछ ही देर में घर की चिंता पुलिस केस में बदल जाती है। लेकिन कहानी सिर्फ गायब बच्चों को ढूंढने तक सीमित नहीं रहती। दूसरी तरफ बाबू और रज्जो नाम के दो अपराधियों की दुनिया भी साथ-साथ चलती है। दोनों छोटे-मोटे अपराध करते हैं, लेकिन एक गलत फैसला चीजों को खतरनाक मोड़ पर पहुंचा देता है। यहीं से समझ आने लगता है कि मामला जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा डरावना है। इधर केस की जिम्मेदारी मिलती है पुलिस अफसर जयप्रकाश (अली फजल) को। अच्छी बात यह है कि यहां जयप्रकाश को किसी टिपिकल फिल्मी पुलिसवाले की तरह नहीं लिखा गया। वह चिल्लाता नहीं, बड़े-बड़े डायलॉग नहीं मारता और हर पांच मिनट में हीरो बनने की कोशिश भी नहीं करता। उसके अपने संघर्ष हैं। पिता (राकेश बेदी) चाहते हैं कि बेटा सिस्टम में नाम बनाए, लेकिन जयप्रकाश खुद अपनी मेहनत से पहचान बनाना चाहता है। सात एपिसोड की यह सीरीज उस दर्दनाक घटना को काफी बारीकी से दिखाती है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, अपराधियों की बेरहमी और पुलिस की बेचैनी दोनों बढ़ती जाती हैं। कुछ सीन्स ऐसे हैं जो सचमुच अनकम्फर्टेबल कर देते हैं।अली फजल इस बार अपने अभिनय से चौंकाते हैं। मिजार्पुर के गुड्डू पंडित के बाद उन्हें इतने शांत और अंदर ही अंदर टूटे पुलिस अफसर के रोल में देखना अलग अनुभव लगता है। कई जगह वह बिना ज्यादा बोले सिर्फ चेहरे के भाव से सीन पकड़ लेते हैं। यही चीज उनके अभिनय को और मजबूत बनाती है। सोनाली बेंद्रे लंबे समय बाद ऐसे किरदार में नजर आती हैं, जहां उन्हें सिर्फ नोस्टाल्जिया फैक्टर की तरह इस्तेमाल नहीं किया गया। एक मां की बेचैनी और टूटन को उन्होंने काफी सच्चाई के साथ निभाया है। आमिर बशीर हमेशा की तरह भरोसेमंद लगते हैं।
लेकिन असली सरप्राइस आकाश मखीजा और रमनदीप यादव देते हैं। बाबू और रज्जो जैसे किरदारों में दोनों ने सिर्फ एक्टिंग नहीं की, कई जगह सच में डर पैदा किया है। दोनों को देखकर कई बार गुस्सा आने लगता है। यही बताता है कि उन्होंने अपना काम बिल्कुल सही पकड़ा है। दिव्या शर्मा और विवान शर्मा अपने छोटे लेकिन असरदार रोल में अच्छा काम करते हैं। वहीं दिव्येंदु भट्टाचार्य भी अपने किरदार में कहानी को मजबूती देते हैं। बस एक शिकायत राकेश बेदी को लेकर जरूर रहती है। सीरीज में उनका रोल अच्छा है, लेकिन स्क्रीनटाइम इतना कम है कि धुरंधर के बाद आॅडियंस शायद उन्हें थोड़ा और देखना पसंद करते। प्रोसित रॉय की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से माहौल बनाना रही है और राख में भी यह बात साफ दिखती है। 70 के दौर का सेटअप, पुलिस जांच का दबाव और हर एपिसोड के साथ बढ़ता तनाव – सीरीज कई जगह आपको लगातार जोड़े रखती है। अच्छी बात यह है कि निर्देशक कहानी को जरूरत से ज्यादा सिनेमेटिक नहीं बनाते। कई सीन्स बेहद साधारण तरीके से फिल्माए गए हैं और शायद इसी वजह से ज्यादा असर छोड़ते हैं। हालांकि दिक्कत यहां यह है कि प्रोसित रॉय कई जगह सस्पेंसको जरूरत से ज्यादा खींचते हैं। कुछ एपिसोड ऐसे लगते हैं जहां कहानी आगे बढ़ने के बजाय बस एक ही मूड में अटक जाती है। यही वजह है कि बीच के हिस्से में सीरीज थोड़ी रफ्तार खो देती है। राख की सबसे बड़ी कमी इसकी धीमी रफ्तार है। अगर आप ऐसी सीरीज देखने के आदी हैं जहां हर 15 मिनट में ट्विस्ट आता रहे, तो शुरूआती एपिसोड आपको पेशेंस टेस्ट जैसे लग सकते हैं।
कलाकार -अली फजल , सोनाली बेंद्रे , आमिर बशीर , राकेश बेदी , दिव्येंदु भट्टाचार्य , आकाश मखीजा , रमनदीप यादव , दिव्या शर्मा और विवान शर्मा
निर्देशक -प्रोसित रॉय
रेटिंग-3/5





