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थिएटर जैसा जादू सिनेमा या ओटीटी में नहीं : आशुतोष राणा

लखनऊ। टीवी से लेकर फिल्मों तक आशुतोष राणा का लंबा करियर रहा है। वहीं आशुतोष थिएटर शो के जरिए भी दर्शकों का दिल जीतते रहे हैं। उनका मानना है कि थिएटर जैसा जादू सिनेमा में नहीं है। खास बातचीत में उन्होंने कहा, ‘मेरा अपना मानना है कि थिएटर का बहुत बड़ा जादू होता है, जो सिनेमा, टेलिविजन या ओटीटी में गायब होता है। क्योंकि किसी भी रिश्ते में रस के लिए आपका कनेक्टिविटी और कम्युनिकेशन दोनों जरूरी होते हैं। कभी हम किसी से कनेक्ट तो कर लेते हैं, कम्युनिकेट नहीं कर पाते। कभी हम कम्युनिकेट कर लेते हैं लेकिन कनेक्ट नहीं कर पाते। इसलिए हमारा जो रस है वो अधूरा रह जाता है। उन्होंने आगे कहा, ‘थिएटर में ये दोनों चीजें होती हैं, तो उसी का परिणाम है कि हमारे महानाट्य को पूरे देश भर में अपार जन समर्थन प्राप्त हुआ। इसी के कारण हम इतनी लंबी यात्रा इतने कम समय में पूरी कर पाए और दुनियाभर में परफॉर्म कर रहे हैं। हम हाल ही में दुबई गए। फिर हम जुलाई के महीने में परफॉर्म करने इंग्लैंड जा रहे हैं।’ वह कहते हैं, ‘किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ा उपहार होता है कि दर्शक उसके अभिनय की दिल से सराहना करें। यह बड़े आनंद का विषय है कि दिल्ली ने कभी भी हमें निराश नहीं किया। अभी तक दिल्ली में हमारे राम के 150 शोज कर चुके हैं। एनएसडी से पासआउट आशुतोष का दिल्ली से पुराना नाता है। वह कहते हैं, ‘दिल्ली हमेशा से एक बड़ा अद्भुत शहर रहा है। इसके अंदर सारे वर्ग, वर्ण और संस्कृतियां हैं। आप जो संस्कार कहते हैं वे सब कुछ आपको दिल्ली के अंदर मिल जाएंगे। यहां पर शिक्षा भी है, यहां पर दीक्षा भी है। हमने हमेशा से दिल्ली को देश की राजधानी के रूप में देखा और अगर हम इतिहास उठाकर देखें तो इस शहर के बनने और बिखरने की बहुत लंबी परंपरा दिखती है। जो शहर बार-बार बन कर बिखरा हो और बिखर कर बना हो तो उसके चित्त का, उसके चरित्र का आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उस शहर की जीने की लालसा कितनी होगी या उस भूमि में कितनी गमक, कितना जीवन होगा।

हर माध्यम की अपनी सीमाएं होती हैं
आशुतोष ने सिनेमा, टीवी, ओटीटी और फिर थिएटर सभी प्लेटफॉर्म में काम किया। इन सभी प्लेटफॉर्म्स में वह क्या फर्क महसूस करते हैं? इस बारे में उन्होंने कहा, ‘इसमें एक और जोड़ दीजिए- लिखना। मेरा यह मानना है कि ये सारे के सारे अभिव्यक्ति के माध्यम हैं। चाहे सिनेमा हो, टेलिविजन हो, ओटीटी हो, थिएटर यानी रंगमंच हो या फिर किताब लेखन। भगवान की कृपा से इन सारे माध्यमों में हमको बराबर से स्वयं को अभिव्यक्त करने का अवसर मिला है, और उन अवसरों को लोगों ने बहुत अच्छे से सराहा भी। मैं इनको सिर्फ माध्यम के तौर पर देखता हूं। मैं यह नहीं देखता कि यह माध्यम बड़ा है, या वह माध्यम छोटा है। मेरा मानना है कि हर माध्यम की अपनी सीमाएं होती हैं और हर माध्यम यदि देखा जाए तो बड़ा है।

अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए स्वयं प्रयास करने चाहिए
अपने इस लंबे करियर के बारे में वह कहते हैं, ‘अभिनय हमारा पैशन भी है, हमारा प्रोफेशन भी है और हमारी एजुकेशन भी है। इसका मतलब है कि अभिनय हमारी आवश्यकता भी है, आदत भी है, सभ्यता भी है और संस्कार भी है। हमें किसी ने चिट्ठी भेजकर तो बुलाया नहीं था कि आप आइए, आप नहीं आएंगे, अभिनय नहीं करेंगे तो कला बंद हो जाएगी। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए जो प्राथमिक और जो आवश्यक प्रयास होते हैं, उन्हें आपको करना चाहिए। तो मैं अपनी तरफ से करता हूं और अगर किसी किरदार को करने की इच्छा होती है, तो उसके लिए प्रयास करता हूं। यदि वह मुझे प्राप्त हो गया तो उसे बहुत अच्छे से करता हूं। यदि प्राप्त नहीं हुआ तो हम यह मानके चलते हैं कि इससे आपको अपने प्रयास को और चौगुना करना पड़ेगा ताकि आने वाली किसी इच्छा पूर्ति में आप अपनी इच्छा को पूरा कर सकें। मैं यह मानकर चलता हूं कि आपको अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए स्वयं प्रयास करने चाहिए।

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