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अषाढ़ की मासिक कलाष्टमी आज, होगी काल भैरव की पूजा

वर्ष में कुल 12 कालष्टमी मनाई जाती है
लखनऊ। कालाष्टमी या काला अष्टमी एक हिंदू त्योहार है जो भगवान भैरव को समर्पित है और हर हिंदू चंद्र माह में ‘कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि’ (चंद्रमा के घटते चरण के दौरान 8वें दिन) पर मनाया जाता है। पूर्णिमा के बाद आने वाली अष्टमी तिथि (आठवां दिन) भगवान काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इस दिन हिंदू भक्त भगवान भैरव की पूजा करते हैं और उन्हें प्रसन्न करने के लिए उपवास रखते हैं। वर्ष में कुल 12 कालष्टमी मनाई जाती हैं। इनमें से मार्गशीर्ष माह में पड़ने वाली जयंती सबसे महत्वपूर्ण है और इसे ‘कालभैरव जयंती’ के नाम से जाना जाता है । रविवार या मंगलवार को पड़ने वाली कालष्टमी को और भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि ये दिन भगवान भैरव को समर्पित हैं। कालाष्टमी के अवसर पर भगवान भैरव की पूजा का त्योहार देश के विभिन्न हिस्सों में पूरे उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। 2026 की कालाष्टमी 7 जुलाई, मंगलवार को है।

कलाष्टमी का महत्व:
आदित्य पुराण’ में कालष्टमी की महानता का वर्णन किया गया है । कालष्टमी पर पूजे जाने वाले मुख्य देवता भगवान काल भैरव हैं, जिन्हें भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है। हिंदी में ‘काल’ शब्द का अर्थ समय होता है, जबकि ‘भैरव’ का तात्पर्य शिव के स्वरूप से है। इसलिए काल भैरव को ‘समय का देवता’ भी कहा जाता है और भगवान शिव के अनुयायी पूर्ण श्रद्धा से उनकी पूजा करते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच वाद-विवाद के दौरान, ब्रह्मा द्वारा कही गई किसी बात से भगवान शिव क्रोधित हो गए। तब उन्होंने महाकालेश्वर का रूप धारण किया और भगवान ब्रह्मा का पांचवां सिर काट डाला। तब से, देवता और मनुष्य भगवान शिव के इस रूप की पूजा ‘काल भैरव’ के रूप में करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो लोग कालष्टमी पर भगवान शिव की पूजा करते हैं, उन्हें भगवान शिव का भरपूर आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह भी एक लोकप्रिय मान्यता है कि इस दिन भगवान भैरव की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से सभी दुख, पीड़ा और नकारात्मक प्रभाव दूर हो जाते हैं।

कलाष्टमी की पूजा विधि
कलाष्टमी भगवान शिव के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन भक्त सूर्योदय से पहले उठकर सुबह जल्दी स्नान करते हैं। वे काल भैरव की विशेष पूजा करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपने पापों की क्षमा मांगते हैं। भक्तगण संध्याकाल में भगवान काल भैरव के मंदिर में भी जाते हैं और वहां विशेष प्रार्थना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि कालष्टमी भगवान शिव का उग्र रूप हैं। उनका जन्म भगवान ब्रह्मा के प्रचंड क्रोध को शांत करने के लिए हुआ था। कलाष्टमी के दिन सुबह के समय दिवंगत पूर्वजों को विशेष पूजा और अनुष्ठान अर्पित किए जाते हैं। भक्त दिनभर का कठोर उपवास रखते हैं। कुछ सच्चे भक्त रात भर जागते रहते हैं और महाकालेश्वर की कथाएँ सुनते हुए समय बिताते हैं। कलाष्टमी व्रत रखने वाले को समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है और जीवन में सभी प्रकार की सफलता प्राप्त होती है। काल भैरव कथा का पाठ करना और भगवान शिव को समर्पित मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। कालाष्टमी के दिन कुत्तों को भोजन कराने की भी परंपरा है, क्योंकि काले कुत्ते को भगवान भैरव का वाहन माना जाता है। कुत्तों को दूध, दही और मिठाई चढ़ाई जाती है। काशी जैसे हिंदू तीर्थ स्थलों पर ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

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