अल्पसंख्यक कश्मीरी हिंदुओं ने पूरी शक्ति से आंदोलन किया
लखनऊ। साल 1967 – कश्मीर घाटी से एक 17 साल की नाबालिग हिन्दू लड़की परमेश्वरी हांडू गायब हो गई। जब सामने आई तो बालिग शादीशुदा परवीन अख़्तर बनकर। जब वो गायब हुई तो लोगों के बीच अफवाहों का दौर भी शुरू हो गया। किसी ने कहा कि वो अपने मुस्लिम सहकर्मी के साथ भाग गई तो किसी ने कहा कि उसका अपहरण करके, जबरन धर्मांतरण करवाया गया है। सच क्या है इसके लिए परमेश्वरी का लोगों के सामने आना जरूरी था। लेकिन वो सामने नहीं आई, सामने आते रहे उसके लिखे इश्तेहार कि उसने अपनी मर्ज़ी से इस्लाम अपनाया है और शादी भी उसकी इच्छा से हुई है। लेकिन उसकी विधवा मां जिनके पति की मृत्यु लगभग 6 महीने पहले ही हुई थी, उसके इन तमाम बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसे भरोसा था तो सिर्फ़ अपनी बेटी पर। वो पुलिस थानों की चक्कर लगाती रही कि एक बार उसे बेटी से मिलने दिया जाए। उस मां की आवाज धीरे-धीरे पूरी घाटी में बसे हिंदुओं की आवाज बनी कि – हमारी बेटी वापस करो। वो बेटी जिसकी उम्र के फर्ज़ी दस्तावेज बनवाए गए। जिसका अपहरण करके रखा गया। जिसका जबरन धर्मांतरण किया गया। जो उस घटना के बाद अपनी मां से अकेले में कभी नहीं मिल सकी। परमेश्वरी हांडू जो उस घटना से पहले लगातार शीतलनाथ मंदिर जाती थी, वो अब आजीवन परवीन अख़्तर बनकर रहेगी। लेकिन इस एक घटना ने पूरी घाटी को हिला दिया था। ये वो एक मुख्य घटना है जो 1990 के विस्थापन का कारण बनी। परमेश्वरी हांडू को वापस लाने के लिए अल्पसंख्यक कश्मीरी हिंदुओं ने पूरी शक्ति से आंदोलन किया था जो विफल हो गया। इसके पीछे पुलिस से लेकर राजनेता तक सभी शामिल थे। इस पूरी घटना पर – 1967 से पहले के भी इतिहास को बताते हुए आशीष कौल की किताब है – 1967 कश्मीर का परमेश्वरी आंदोलन। इस किताब में उन लोगों का जिÞक्र है जिन्होंने इस आंदोलन में जान दी, गिरफ़्तारी दी और डिगे नहीं। जिन्होंने इस मुद्दे को तमाम खतरों के बाद भी केन्द्र तक पहुंचाने के कोशिश की। उस समय घाटी के हिंदुओं के खिलाफ किस तरह के षडयंत्र हुए, उसमें कैसे सरकारी तंत्र भी शामिल था, इसी पर ये पूरी किताब है। लगभग 183 पन्नों की इस किताब में कश्मीर के शीतलनाथ मंदिर के वृहद इतिहास का भी वर्णन है। एक ऐसा मंदिर जो 1947 और उससे पहले के भी तमाम आंदोलनों और सभाओं का गवाह है। जिसके प्रति हर एक कश्मीरी हिंदू के मन में अगाध श्रृद्धा है। राजा हरीसिंह से लेकर फारुख अब्दुल्ला और कश्मीर के कई इलाकों और उनकी संवेदनशीलता का भी जिÞक्र है। कैसे एक नाबालिग लड़की के गायब होने से जुड़ा आंदोलन कश्मीर से हिंदुओं के विस्थापन तक जा पहुंचा।





