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कला जगत में लखनऊ के कलाकार भी बढ़ा रहे शहर का मान

लखनऊ । जिस तरह लखनऊ की तहजीब और अदब को पूरी दुनिया में सम्मान मिलता है। उसी तरह यहां की कला और संस्कृति का भी अपना अलग मुकाम है। लखनऊ में कला का विकास नवाबों के समय से शुरू हो गया था, लेकिन इसको प्रसिद्धि और महत्व 1911 में गवर्नमेंट कॉलेज आॅफ आर्ट एंड क्राफ्ट के बनने के बाद मिला। लखनवी सरजमीं पर ऐसे बहुत से चित्रकार, मूर्तिकार हुए, जिन्होंने अपने काम से इस कला को ना सिर्फ भारत बल्कि पूरे विश्व में पहचान दिलाई. हम आपको ऐसे ही कलाकारों के बारे में बताने जा रहे हैं. जिन्होंने अपने काम के दम पर न सिर्फ लखनऊ का नाम रोशन किया, बल्कि कला जगत को एक से बढ़कर एक कलाकार भी दिए। शहर ने असित कुमार हालदार, बिरेश्वर सेन, मदनलाल नगर, जय नारायण सिंह जैसे कई अनमोल कलाकारों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया है. आने वाली पीढ़ी भी कलाकारी के स्तर को और आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।

लैक्सिट तकनीक का किया विकास :
असित कुमार हालदार अवनींद्र नाथ ठाकुर के शिष्य और 1925 में गवर्नमेंट कॉलेज आॅफ आर्ट एंड क्राफ्ट के प्रधानाचार्य बने. हाल्दार उन कलाकारों में थे जो किसी एक शैली में बंध कर नहीं रहे. उन्होंने मध्य अजंता, जोगीमारा, वाष भित्ति चित्रों की अनुकृति की. वे पेंसिल, तूलिका, रेखांकन, जल रंग, वाश शैली, टेम्परा आदि विधाओं में काम करते थे. उनको बचपन से ही चित्रकला के साथ काव्य लेखन में रुचि थी. लखनऊ कला एवं शिल्प महाविद्यालय में उन्होंने जगाई-मधाई व नित्यानंद और भवन निमार्ता अकबर का भित्ति चित्र बनाया. उनका प्रमुख पक्ष तकनीक के साथ काम करना था. उन्होंने लकड़ी पर लाख से चित्रण कर लैक्सिट तकनीक का विकास किया।

अमेरिका के कई संग्रहों में हैं कलाकृतियां :
जय कृष्ण अग्रवाल छापा कला यानी ग्राफिक विधा के कलाकारों में जय कृष्ण अग्रवाल का नाम अहम स्थान रखता है. ललित कला में प्रवेश लेने के बाद उनकी रुचि छापा कला की ओर बढ़ने लगी. उस समय के प्राचार्य सुधीर खास्तागीर ने उनको दिल्ली के आर्ट कॉलेज के ग्राफिक कला विभाग के अध्यक्ष सोमनाथ होर से मिलने की सलाह दी. स्पष्टता, शुद्धता, छाया प्रकाश का क्रमिक परिवर्तन उनकी सबसे बड़ी विशेषता है. उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी कृतियां आधुनिक कला दीर्घा व अमेरिका के कई संग्रहों में संग्रहीत हैं. उन्होंने अपनी कला के माध्यम से कई युवा कलाकारों को आकर्षित किया. इनमें गोपालदत्त शर्मा, संदीप भाटिया, किरन सिंह समेत कई नाम शामिल हैं।

कला में दिखाई प्रयोगशीलता :
जय नारायण सिंह लखनऊ कला जगत में जय नारायण सिंह का नाम लिए बिना बात पूरी ही नहीं हो सकती. मूर्तिकार के रूप में उन्होंने स्वतंत्र विचारों को अपनाया. जय नारायण ने अपनी कला में काफी प्रयोगशीलता दिखाई, जब व्यक्तिमूर्ति, अलंकारिक मूर्ति शिल्प हो रहा था, तब उन्होंने संकेतों, उपमानों, विचारों को आधार मानकर मूर्तिकला करनी शुरू की. उन्होंने इसकी कहीं से शिक्षा नहीं हासिल की. केवल अभ्यास और अपनी प्रयोगशीलता से इसको आगे बढ़ाया. वे प्लास्टर आॅफ पेरिस, सोपस्टोन, ग्रेनाइट, फायरवुड आदि को माध्यम बनाकर अपनी कृतियों को बनाया करते थे. वे अधिकतर खुरदरे टेक्स्चर में काम करते थे. लखनऊ में इस तरह के वे पहले कलाकार थे. दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में उनकी मूर्तिशिल्प कमांड को दूसरा पुरस्कार मिला था, जबकि उस आयोजन में प्रथम पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया था. भारत-चीन युद्ध के समय निर्मित युद्ध पर शांति की विजय उनके प्रयोगों का एक उत्कृष्ट नमूना है।

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