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चराग़-ए-इल्म की पहली रौशनी — प्रोफेसर नाज़ेमा अंसारी

गुजरात की सरज़मीन, जो तहज़ीब व रिवायत की ख़ुशबू से महकती रही है, आज एक नए बाब-ए-तारीख़ की अमीन बनी। इल्म के उफ़क़ पर एक ऐसा चराग़ रौशन हुआ जिसकी लौ में बरसों की मेहनत, कुर्बानी और ख़्वाबों की ताबीर जगमगा रही थी।

शहर अहमदाबाद की गुजरात यूनिवर्सिटी के वसीअ व अरीज़ अहाते में, गुजरात आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज के सदर-ए-शोबा-ए-उर्दू (एसोसिएट प्रोफेसर) डॉक्टर नाज़ेमा अंसारी की ज़ेर-ए-निगरानी में वह यादगार लम्हा मयस्सर आया जिसका इंतज़ार मुद्दतों से था। डॉक्टर नाज़ेमा अंसारी साहिबा की सरपरस्ती में दो दानिशवर और मेहनती तलबा, कुरैशी और अहमद हसन ने अपनी इल्मी मुसाफ़त को कामयाबी से तय करते हुए पीएचडी का मक़ाला मुकम्मल किया और यूँ गुजरात में उर्दू की पहली पीएचडी का संग-ए-मील क़ायम हुआ।

मुहम्मद यासीन कुरैशी ने अपने तहक़ीकी मक़ाले में नैयर मसऊद की शख्सियत और फ़न का अमीक मुतालआ पेश किया, जबकि अहमद हसन ने ख़लीलुर्रहमान आज़मी के फ़िक्री और तनक़ीदी पहलुओं को अपनी तहक़ीक का महवर बनाया। दोनों स्कॉलर्स ने अपने वाइवा के दौरान निहायत एतिमाद और वक़ार के साथ अपने मक़ालों का ख़ुलासा पेश किया और माहिरीन व असातिज़ा के सवालात के मदल्लल और शाइस्ता जवाबात देकर सबको मुतास्सिर किया।

इस इल्मी नशिस्त में बेरूनी मुम्तहिन की हैसियत से डॉक्टर कीर्ति मालनी, जो अपने मैदान-ए-तहक़ीक में एक मोअतबर और साहिब-ए-बसीरत इल्मी शख्सियत हैं, अंबेडकर यूनिवर्सिटी औरंगाबाद से तशरीफ़ लाईं, जबकि डॉक्टर शकील अहमद, जो सेवा सदन महाविद्यालय बुरहानपुर से वाबस्ता एक मुमताज़ उस्ताद और संजीदा मुहक़्क़िक हैं, बुरहानपुर से इस नशिस्त में शरीक हुए। दोनों मुअज़्ज़ज़ मेहमानों ने न सिर्फ़ तलबा की इल्मी काविशों को सराहा बल्कि अहमदाबाद की मेहमाननवाज़ी, इल्मी फ़िज़ा और तहज़ीबी रंग को भी दिल से ख़िराज-ए-तहसीन पेश किया।

प्रोफेसर नाज़ेमा अंसारी ने अपनी गुफ़्तगू में इस तवील जद्दोजहद का ज़िक्र किया जो इस ख़्वाब को हक़ीक़त बनाने में दरपेश रही। 2018 में दाख़िला लेने वाले तलबा ने न सिर्फ़ तालीमी मुश्किलात बल्कि कोरोना जैसे सख़्त दौर का भी सामना किया। कई साथी रास्ते में बिछड़ गए, मगर ये चंद चराग़ आँधियों में भी रौशन रहे और आख़िरकार अपनी मंज़िल पा ली।

यह कामयाबी सिर्फ़ तलबा की नहीं बल्कि एक उस्ताद के ख़्वाब की ताबीर भी है—एक ऐसा ख़्वाब जिसके लिए कुर्बानियाँ दी गईं, अपनों से दूरी बर्दाश्त की गई, और मुसलसल मेहनत की गई।

इसी जज़्बे को डॉक्टर अल्लामा इक़बाल ने अशआर में यूँ कहा है:

“हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा”

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