लखनऊ। जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के अत्यंत प्राचीन और पवित्र धार्मिक उत्सवों में से एक है, जो आस्था, भक्ति और परंपरा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यह भव्य पर्व मुख्य रूप से ओडिशा राज्य के पुरी शहर में स्थित जगन्नाथ मन्दिर से प्रारंभ होता है और भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा देवी को समर्पित होता है। इस अवसर पर तीनों देवताओं की दिव्य प्रतिमाओं को अत्यंत सुंदर और भव्य रूप से सजाए गए विशाल रथों में विराजमान किया जाता है और उन्हें नगर भ्रमण कराते हुए गुंडीचा मन्दिर तक ले जाया जाता है जिसे उनकी मौसी का घर माना जाता है। यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। इसमें लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से शामिल होते हैं। भक्त रथों की रस्सियों को खींचकर स्वयं को भगवान की सेवा से जोड़ने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस पवित्र यात्रा में भाग लेने या दर्शन मात्र से व्यक्ति के जीवन में पुण्य की प्राप्ति होती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 का आयोजन इस वर्ष जुलाई माह में बड़े धूमधाम और श्रद्धा के साथ किया जाएगा। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पवित्र यात्रा की शुरूआत 16 जुलाई गुरुवार को होगी। द्वितीया तिथि 15 जुलाई प्रात: 11:50 बजे से शुरू होकर 16 जुलाई प्रात: 08:52 बजे तक रहेगी। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को रथों में विराजमान कर नगर भ्रमण कराया जाएगा। इस भव्य उत्सव का समापन बहुदा यात्रा यानी वापसी यात्रा के साथ होगा, जो 24 जुलाई 2026 (शुक्रवार) को आयोजित की जाएगी। यह पूरी यात्रा भक्तों के लिए अत्यंत शुभ और पुण्यकारी मानी जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होकर भगवान के दर्शन और रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
भगवान का नगर भ्रमण
जगन्नाथ रथ यात्रा में यह मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए जगन्नाथ मंदिर से बाहर आते हैं। वे अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथों पर विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं। यह अवसर भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है, क्योंकि इसमें उन्हें प्रत्यक्ष रूप से भगवान के दर्शन का सौभाग्य मिलता है।
तीन दिव्य रथों की विशेषता
इस यात्रा में तीनों देवताओं के लिए अलग-अलग भव्य रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदी घोष 16 पहियों का होता है, बलभद्र जी का रथ तालध्वज 14 पहियों वाला होता है, और सुभद्रा जी का रथ दर्पदलन 12 पहियों का होता है। इन रथों को अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ भक्तों द्वारा खींचा जाता है, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक है।
छेरा पहनरा परंपरा
यात्रा शुरू होने से पहले एक महत्वपूर्ण परंपरा छेरा पहनरा निभाई जाती है। इसमें ओडिशा के गजपति राजा स्वयं सोने की झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा विनम्रता और समानता का संदेश देती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं, चाहे वह राजा हो या आम भक्त।
धार्मिक मान्यता और महत्व
इस पवित्र यात्रा में शामिल होना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि रथ को खींचने या इस यात्रा में भाग लेने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति प्राप्त होती है। यह यात्रा भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और भगवान के प्रति गहरी आस्था का प्रतीक है।





