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अयोध्या की रामलीला

चौदह वर्ष का वनवास काटकर श्रीराम जब अयोध्या लौटते हैं तो उनका वैदिक विधि विधान से राज तिलक किया जाता है। राज्याभिषेक के समय श्रीराम जब एक राजा के रूप में प्रजा पालन का संकल्प लेते हैं तो वे कहते हैं कि अयोध्या का राजा बनने के बाद मेरा कुछ भी निजी नहीं होगा, अयोध्या की प्रजा का सुख-दुख हमारा सुख-दुख होगा, अयोध्या की प्रजा की खुशी में हमारी खुशी होगी, सबको न्याय मिलेगा और राजधर्म का पालन करने के लिए अगर हमे अपनी जान भी देनी पड़े तो इसमें एक पल भी देर नहीं करुंगा।

वर्तमान स्वरूप में राष्ट्रीय राज्यों के उदय के पहले ही दुनियाभर के दार्शनिकों ने आदर्श राजा पर चिंतन-मनन शुरू कर दिया था और एक राजा के रूप में व्यक्ति में कौन-कौन से गुण होने चाहिए, कौन-कौन से त्याग होने चाहिए, राजधर्म का पैमाना क्या होना चाहिए, इस पर व्यापक चर्चा की गयी है। महान दार्शनिक प्लेटो का तो लगभग संपूर्ण दर्शन आदर्श राजा के अन्वेषण पर ही केन्द्रित है।

दार्शनिकों के इतने चिंतन और लोकतंत्र में इतने चुनाव के बाद भी, दुनिया में आज तक एक भी ऐसा राजा नहीं मिला, जो शासक के रूप में श्रीराम चन्द्र के द्वारा प्रजापालन व राजधर्म के पालन के लिये किये गये त्याग एवं बलिदान की बराबरी कर सके। श्रीराम ने अयोध्या की प्रजा की सुख-समृद्धि के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था।

प्रजा के प्रश्न उठाने पर प्राणप्रिय सीता से जुदाई सही और विधि के समान संरक्षण के लिए हमेशा परछाई की तरह साथ रहने वाले लक्ष्मण को कठोरतम दण्ड दिया। भालू, वानरों की सेना जोड़कर पाप व अन्याय को खत्म किया, जरूरत पर पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों से भी मदद ली, सबरी के बेर खाकर बराबरी का संदेश दिया और प्रजा के मत का सम्मान करते हुए सीता को त्याग दिया।

ऐसे सर्वसमावेशी श्रीराम का चरित्र पूरी दुनिया के लिए एक बहुमूल्य धरोहर है। आज समाज में जिस तरह की अनैतिकता, हिंसा, नफरत और अपराध देखने को मिल रहे हैं, विस्तारवाद की आग दुनिया को भस्म करने पर आमादा है, राजा राजधर्म निभाने के बजाय स्वहित साधने में जुटे रहते हैं, इन तमाम बुराइयों के शमन के लिए जरूरी है कि हरेक व्यक्ति श्रीराम के चरित्र को जाने और समझे।

श्रीराम का चरित्र सामाजिकता, नैतिकता, धर्म और प्रशासन के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है। रामलीला के जरिये श्रीराम के समावेशी चरित्र का मंचन होता है तो इससे समाज में संदेश जाता है। आज हम जितनी समस्याएं देख रहे हैं यह सब श्रीराम के चरित्र एवं उनके समावेशी संस्कृति से कटने का परिणाम है। इसलिए अयोध्या में भव्य रामलीला दरअसल रामराज्य की दिशा आगे बढ़ने का संकल्प है।

कोरोना काल में रामलीला का मंचन अपने-आप में बड़ी चुनौती है लेकिन संतोष का विषय है कि अयोध्या में रामलीला का मंचन हो रहा है। लेकिन रामलीला को सिर्फ अयोध्या, उत्तर भारत या फिर कुछ देशों तक ही सीमित रखना दुनिया के साथ न्याय नहीं होगा। आज ईसाई मिशनरीज हमेशा धर्म के प्रसार में लगे रहते हैं, धर्मांतरण और धर्म को थोपने की घटनाएं भी हो रही हैं।

ऐसे में भारत को श्रीराम के चरित्र से पूरी दुनिया को परिचित कराना चाहिए और इसके लिए रामलीला का मंचन प्रमुख माध्यम बन सकता है। अयोध्या में रामलीला होनी ही चाहिए लेकिन भारत सरकार को दूतावासों के जरिये पूरी दुनिया में स्थानीय भाषाओं में रामलीला एवं रामचरित्र का मंचन कराना चाहिए ताकि श्रीराम के चरित्र, आदर्श और राजधर्म के प्रति उनकी निष्ठा से पूरी दुनिया सबक सीखे।

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