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थानेवार चिन्हित हों माफिया

कानपुर देहात में माफिया सरगना विकास के दुस्साहसिक कृत्य और उसमें आठ पुलिस कर्मियों के मारे जाने के बाद सरकार ने माफियाओं के खिलाफ प्रदेशव्यापी अभियान छेड़ने का फैसला किया है। जरायम की दुनिया के कई बड़े नामों के खिलाफ कार्रवाई शुरू भी हो गयी। सरकार 25 माफियाओं की सूची बनाई है जिनके खिलाफ सख्त एक्शन लेगी। सबसे पहले तो यह कि प्रदेश में माफियाओं की संख्या हजारों में है इसलिए 25 पर कार्रवाई केन्द्रित रखने से सरकारी अभियान को प्रचार भले मिले इससे भयमुक्त समाज का वातावरण नहीं बनेगा।

कानून का राज कायम करने के लिए स्पष्ट नीति बनाकर आगे बढ़ा जाये तो निश्चित रूप से सरकार को बड़ी सफलता मिल सकती है। विकास दुबे पर राज्यमंत्री, स्कूल प्रबंधक, व्यवसायी सहित कई हत्याओं सहित साठ मुकदमा दर्ज था। उसने आठ पुलिसकर्मियों की हत्या न की होती तो बाकी साठ अपराधों को अंजाम देने के बाद भी उसके जरायम का साम्राज्य ज्यों का त्यों चल रहा था और इसमें पुलिस व प्रशासन के लोग भी मददगार थे।

सुविचारित नीति न होने के कारण ही ऐसा था और इसी खामी का फायदा उठाकर अपराधी राजनीतिक संरक्षण पाते हैं। पुलिस और प्रशासन के लोग उनसे लाभ लेते हैं और बदले में उनकी मदद करते हैं। अगर राजधानी लखनऊ की ही बात की जाये तो हर मोहल्ले में एक-दो माफिया मिल जायेंगे जिनके पास वैध-अवैध कई असलहे होंगे, अनेक लोगों की संपत्तियां हड़प ली होंगी, तमाम सरकारी जमीनों पर कब्जा कर लिया होगा और कई लोगों की हत्या, हत्या के प्रयास और सुपारी वगैरह भी ली होगी।

अब अगर एक नीति हो जिसमें अगर एक व्यक्ति पर तीन-चार मुकदमें दर्ज हो जायें तो उसे जेल में भेज दिया जाये और तब तक न छोड़ा जाये जब तक वह सभी मामलों में सभी अदालतों से बरी न हो जाये। राजधानी लखनऊ में ही ऐसे अपराधी हैं जो कई हत्याएं कर चुके हैं और जेल में हैं, लेकिन जैसे ही जेल से छूटते हैं अगली हत्या कर देते हैं। ऐसे पेशेवर अपराधियों के लिए कठोर सजा के साथ हमेशा जेल में रखने की नीति होनी चाहिए।

जिन माफियाओं पर कार्रवाई करने का फैसला किया गया है वे कोई नये नवेले नहीं है बल्कि दशकों से जरायम की दुनिया में हैं। अगर शुरू से इन पर लगाम कसा जाता है तो इतने बड़े माफिया बनते नहीं। हर मोहल्ले में माफियाओं के नाम लोगों की जुबान पर होते हैं, लेकिन पुलिस इन पर कार्रवाई करने के बजाय अवैध वसूली में लगी रहती है। हालात इतने बदतर हैं कि इन माफियाओं के शुभचिंतक राजनीति में भी हैं, प्रशासन में भी हैं और पुलिस में भी हैं।

अधिकांश माफिया प्रापर्टी के धंधे में हैं और लेखपाल, पुलिस से लेकर प्राधिकरण तक में संरक्षक मौजूद होते हैं और यही कारण है कि ये माफिया फलते-फूलते रहते हैं। इसलिए 25 ही नहीं बल्कि थानेवार हत्या, डकैती, दुराचार और जमीन कब्जाने के ऐसे आरोपियों को जिन पर चार-पांच मामले हों उनको जेल भेजा जाये।

अवैध संपत्तियां जब्त की जायें, पुलिस, प्रशासन और राजनीति में उनके शुभचिंतको ंपर भी कार्रवाई हो। जब इस तरह की स्पष्ट नीति बनाकर सब पर ईमानदारी से कार्रवाई होगी तो न माफिया बचेंगे, न उनके संरक्षक बचेंगे और न ही ऐसी कार्रवाई पर कोई सवाल उठेंगे।

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