इसी तिथि पर उनका प्राकट्य हुआ था
लखनऊ। बगलामुखी जयंती वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाई जाती है। बगलामुखी देवी को दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या माना गया है। कहते हैं कि इसी तिथि पर उनका प्राकट्य हुआ था। ऐसे में बगलामुखी जयंती पर विधि-विधान से देवी की पूजा-अर्चना करने का खास महत्व होता है। मान्यता है कि देवी के इस रूप की आराधना करने से आरोग्य में वृद्धि होती है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो सकती है। कहते हैं की श्रद्धा भाव से विधि-पूर्वक बगलामुखी देवी की पूजा करने से मां भक्तों मनोकामनाएं पूरी करती हैं। पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 23 अप्रैल, गुरुवार के दिन रात में 8 बजकर 50 मिनट पर होगा। वहीं, अगले दिन यानी 24 अप्रैल, शुक्रवार के दिन शाम को 7 बजकर 22 मिनट तक अष्टमी तिथि व्याप्त रहेगी। इसके उपरांत नवमी तिथि का आरंभ हो जाएगा। ऐसे में उदया तिथि की गणना के अनुसार, 24 अप्रैल को ही बगलामुखी जयंती मनाई जाएगी।
बगलामुखी जयंती 2026 पूजा विधि
वैशाख शुक्ल अष्टमी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनना बेहद शुभ माना जाता है।
पूजा घर को अच्छी तरह साफ करके वहां लकड़ी की चौकी पर पीले रंग का आसन बिछाएं। फिर, देवी बगलामुखी की प्रतिमा को वहां स्थापित करें और चारों ओर गंगाजल छिड़कें।
देवी को पीले फूल, फल, चंदन आदि अर्पित करें और घी का दीपक जलाकर रखें। इसके बाद, धूप, दीप आदि से विधि-विधान से देवी की पूजा करें।
बगलामुखी देवी की आरती करने के पश्चात उन्हें बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी कर सकते हैं। ऐसा करने से बेहद शुभ फल प्राप्त होता है।
बगलामुखी देवी की महिमा
मान्यताओं और कथा के अनुसार, सतयुग के समय में एक तूफान आया था जो विनाश करने वाला था। पूरी भूमि पर उससे त्राहि-त्राहि मची हुई थी। ऐसे में विष्णुजी चिंतित होकर भगवान शिव की आराधना करके उसने इसका हल पूछने लगे। तब भोलेनाथ ने बताया कि केवल शक्ति ही इस महाविनाश को रोक सकती हैं। यह जानने के बाद विष्णुजी ने हरिद्रा सरोवर पर तप किया और उनके इस कठोर तप से हरिद्रा में एक तेज उत्पन्न हुआ, जिससे देवी बगलामुखी का प्राकट्य हुआ। विष्णुजी की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनसे कोई भी वर मांगने को कहा। इस पर भगवान विष्णु ने देवी से कहा कि इस सृष्टि का विनाश रुक जाए। तब मां बगलामुखी ने तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गईं। इस दिन वैशाख शुक्ल अष्टमी तिथि थी। इसलिए इस तिथि पर देवी बगलामुखी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।





