लखनऊ। वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन कृष्णपिङ्गल संकष्टी मनाई जाती है। यह दिन भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कृष्णपिङ्गल संकष्टी के दिन गणेश जी की पूजा-अर्चना करने से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और बिगड़े काम पूरे होते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, आज यानी 03 जुलाई को कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी को मानई जाएगी। संकष्टी” शब्द का अर्थ होता है ” कठिन समय से छुटकारा,” और इस दिन भगवान गणेश का पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा भाव से पूजन करने से गणेश जी हमें सभी संकटों और कठिनाइयों से मुक्ति प्रदान करते हैं।
श्री गणेश जी सिद्धिविनायक है। उनके रूप अनेक हैं पर हाथी के मस्तक वाला रूप जिसमे उनके एक दाँत है, कान सूप के समान सुंदर है ,हाथों में पाश और अंकुश धारण कर रखा है। जो स्त्री पुरुष इस रूप की सच्ची भावना से पूजा अथवा व्रत करता है वह मनुष्य जिस भी धर्म संगत फल की कामना करता है उसे वह सब प्राप्त हो जाता है। भगवान शिव जी ने स्वयं शिवपुराण में कहा है कि गणेश भगवान प्रथम पूजनीय है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी ने कहा- जो मनुष्य गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम न करके पहले हमारी करेगा तो उसे उस पूजा का कोई फल नहीं प्राप्त होगा।
संकष्टी चतुर्थी में चंद्रमा को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि चंद्रोदय के बाद भगवान गणेश की पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है। इस दिन चंद्रमा को जल, दूर्वा, अक्षत और पुष्प अर्पित करके श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की जाती है। पुराणों के अनुसार चंद्रदेव को मन का कारक माना गया है। इसलिए संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता यह भी है कि भगवान गणेश और चंद्रमा से जुड़ी पौराणिक कथा के कारण इस दिन चंद्र दर्शन का विशेष महत्व बताया गया है।
पूजा विधि
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह उठकर स्नान करें और भगवान गणेश का ध्यान करें। दीपक जलाकर आरती करें और व्रत कथा का पाठ करें। भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा अर्पित करें। पूजा में लाल फूल, अक्षत, धूप, दीप और चंदन का उपयोग करें। मोदक या तिल के लड्डू का भोग लगाएं। व्रत के दौरान सात्विक भोजन का सेवन करें। व्रत में सेंधा नमक का प्रयोग करें। किसी से वाद-विवाद न करें। किसी के बारे में गलत न सोचें। काले रंग के कपड़े भूलकर भी धारण न करें।
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी पर क्या दान करें?
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन दान करने का अधिक महत्व है। इस दिन पूजा-अर्चना करने के बाद गरीबों या मंदिर में अन्न-धन समेत आदि चीजों का दान करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन चीजों का दान करने से साधक को जीवन में शुभ परिणाम देखने को मिलते हैं।





