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परम सत्ता से साक्षात्कार

परम सत्ता के साथ जब आत्मा का साक्षात्कार होता है तो मनुष्य का ईश्वर के साथ सानिध्य स्थापित हो जाता है। आत्म जब ईश्वर के निकट होती है तो उसको परम आनन्द की अनुभूति होती है। जिसमें परमात्मा की सम्पूर्ण सत्ता की व्याख्या को तो अचित्य नेति-नेति कह कर बौद्धिक असमर्थता प्रकट कर दी गयी है पर मनुष्य के साथ परमात्म सत्ता का जितना तालमेल बैठता है उस पर कई दृष्टियों से प्रकाश डाला जाता है।

आत्मा के साथ परमात्मा का मिलन निस्संदेह लोहे और पारस के सम्पर्क में सोना बन जाने वाली किवदन्ती सच्चे अर्थो में सार्थक देखी जा सकती है। अमृत और कल्पवृक्ष के लाभ महात्म्य का जो अलंकारिक वर्णन मिलता है उसे परमात्मा के सान्ध्यि से मिलने वाली भौतिक तथा आत्मिक उपलब्यिों को देखते हुए अक्षरश: सही माना जा सकता है। सिद्धियों का चमत्कारी अलौकिकताओं का जो विवरण सधना ग्रंथों में मिलता है, उसे परमात्म सत्ता के साथ जीवात्म के सानिध्य सम्पर्क को सुनिश्चित प्रतिक्रिया कहा जा सकता है।

ईश्वर प्राप्ति को जीवन लक्ष्य की पूर्ति पूर्णता में परिणित परम पुरुषार्थ परम लाभ आदि नामों से पुकारा जाता है। आत्मा को परमात्मा की उच्च स्थिति में विकसित कर लेने वाले व्यक्ति निस्संदेह नर रूप में नारायण कहे जा सकते हैं। उनकी विशेषताओं और विभूतियों का वारापार नहीं रहता। आस्था का तीसरा पक्ष है- सद्ज्ञान। इसे विचार विज्ञान कह सकते हैं।

विचारों की प्रचण्ड शक्ति और उनकी प्रतिक्रियाओं से बहुत कम लोग परिचित होते हैं। तथ्य यह है कि हाड़ मांस के पुतले में जितना चेतन चमत्कार देखा जाता है वह सब विचार वैभव का ही परिणाम है। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता, निकृटता मनुष्य की प्रतिभा, वरिष्ठता और सर्वतोमुखी दुर्बलता का मूल्यांकन किसी के विचारों का स्तर देख कर ही किया जा सकता है।

सफलता और अफलता के कारण साधनों का, परिस्थितियों का नहीं, संकल्प शक्ति और व्यवस्था बुद्धि का ही प्रमुख महत्व रखता है। लोग गलत ढंग से सोचते हैं और गलत विचारों को अपनाते हैं। फलत:जीवन का स्वरूप और भविष्य दोनों की अंधकार से ढ़क जाते हैं। मस्तिष्क को जिस तरह सोचने की आदत है, उसका गुण-दोष के आधार पर विवेचन करते हुए मात्र औचित्य को अपनने की सहसिकता को मनस्विता कहते हैं।

मनस्वी लोग ही जीवन का सच्चा आनन्द लेते हैं और दूसरों के श्रद्धा भाजन बनते हैं। स्वाध्याय और सत्संग द्वारा श्रेष्ठ विचारकों से सम्पर्क साधा जाता है और चिंतन, मनन द्वारा आंतरिक उत्कृष्टता को उभार कर उच्च स्तरीय निष्ठाओं पर आरूढ़ हुआ जाता है। दर्शन शास्त्र इसी कांट-छांट के लिए बना है।

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