लखनऊ: भारत में हर साल बड़ी मात्रा में टमाटर कटाई के बाद खराब हो जाते हैं। टमाटर की शेल्फ लाइफ (ताज़ा रहने की अवधि) कम होने के कारण भंडारण और परिवहन के दौरान यह जल्दी नरम पड़ जाता है, पानी खो देता है तथा फफूंद और बैक्टीरिया के कारण सड़ने लगता है। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान होता है और बड़ी मात्रा में टमाटर उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले ही खराब होकर बर्बाद हो जाते हैं।
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रो. मोहम्मद इसराईल अंसारी के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक नई पर्यावरण-अनुकूल ग्रीन नैनो तकनीक विकसित की है। शोधकर्ताओं ने पान की पत्तियों के प्राकृतिक अर्क से ग्रीन गोल्ड नैनोकण तैयार किए और उनका टमाटर के पौधों के फलों पर छिड़काव किया।

प्रो. अंसारी के अनुसार, यह ग्रीन तकनीक टमाटर के लिए एक सुरक्षात्मक कवच की तरह काम करती है। यह टमाटर के पकने की प्रक्रिया को धीमा करती है और उसे फफूंद तथा हानिकारक बैक्टीरिया से बचाती है। इसके कारण बिना किसी हानिकारक रसायनों के टमाटर अधिक समय तक ताज़ा बने रहते हैं।
शोध में पाया गया कि इस तकनीक से उपचारित टमाटर लगभग तीन सप्ताह तक ताज़ा रहे, जबकि सामान्य टमाटर इससे काफी पहले खराब हो गए। उपचारित टमाटरों में पानी की कमी कम हुई, वे अधिक समय तक सख्त और ताज़ा बने रहे तथा भंडारण और परिवहन के दौरान उनकी गुणवत्ता भी बेहतर बनी रही।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि यह तकनीक टमाटर की प्राकृतिक सुरक्षा क्षमता को मजबूत बनाती है। साथ ही यह उन फफूंद और सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को भी रोकती है जो टमाटर की सड़न के लिए जिम्मेदार होते हैं। इससे कटाई के बाद होने वाली खराबी और नुकसान में काफी कमी आती है।
प्रो. अंसारी ने कहा कि यह पर्यावरण अनुकूल तकनीक भविष्य में फलों के संरक्षण के लिए उपयोग किए जाने वाले हानिकारक रसायनों का सुरक्षित विकल्प बन सकती है। यदि इसे बड़े स्तर पर अपनाया जाए, तो इससे किसानों को कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने, बेहतर कीमत प्राप्त करने और बाज़ार में अधिक समय तक ताज़े टमाटर उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। उपभोक्ताओं को भी अधिक समय तक ताज़ा और अच्छी गुणवत्ता वाले टमाटर मिल सकेंगे।
यह महत्वपूर्ण शोध नीदरलैंड के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान एल्सेवियर, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध पत्रिका प्लांट नैनो बायोलॉजी, जून 2026 में प्रकाशित हुआ है, जो इस शोध की वैश्विक महत्ता को दर्शाता है।
प्रो. अंसारी का मानना है कि सुरक्षित और टिकाऊ खाद्य संरक्षण तकनीकों की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए यह ग्रीन नैनो तकनीक भविष्य में खाद्य अपव्यय कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।





