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अस्सी प्रतिशत साहित्यकार अपनी हिंदी अपनी जेब में रखकर चलते हैं : व्योमा मिश्रा

बालकथाओं का फ्रÞेंच से हिंदी में अनुवाद किया
लखनऊ। व्योमा मिश्रा एक मानी हुई साहित्यकार, अनुवादक और स्थापित सृजनात्मक एडिटर और प्रूफ-रीडर हैं और लंबे समय से इस क्षेत्र में कुशलतापूर्वक कार्य कर रही हैं। आपका हिंदी के अतिरिक्त फ्रÞेंच भाषा पर भी अधिकार है बहुत-सी पुस्तकों, कहानियों और बालकथाओं का फ्रÞेंच से हिंदी में अनुवाद किया है। बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न व्योमा मिश्रा के साथ खास बातचीत।

इस कार्य के प्रति आपका रुझान कैसे हुआ? आप कब से यह कार्य कर रही हैं?
व्योमा – पहली बात तो ये है शैली जी कि प्रूफ-रीडिंग नीरस कार्य नहीं, एक अत्यंत रुचिकर कार्य है; और रुझान यूँ कि यह एक मास्टरनी की निगाह विरासत में मिलने का परिणाम है। प्रूफ-रीडिंग में बारीक और पैनी निगाह की आवश्यकता होती है; जो मुझमें जन्मजात थी। अपने स्कूल के दिनों में, मैं हमारे स्कूल की वार्षिक-पत्रिका दीपशिखा की संपादक थी। तभी से संपादन और प्रूफ-रीडिंग की बारीकियों को मैंने जाना-समझा और उन्हें अपने लेखन में स्थान दिया। फिर तो जो भी काम मिलता गया, करती चली गई।

आपके अनुसार साहित्य में प्रूफ-रीडिंग का क्या महत्त्व है?
व्योमा- लेखन या टाइपिंग की त्रुटियाँ सुधारने के अलावा प्रूफ-रीडिंग के अन्य कई पहलू हैं। इस पर विस्तार से बात करना आवश्यक है। देखिये, लेखन का संपूर्ण कार्य लेखक द्वारा संपन्न किया जाता है; जिसमें प्रूफ-रीडर की भूमिका नगण्य होती है। पहले के जमाने में हस्तलिखित पांडुलिपियाँ मुझे मिलती थीं और मैं भी एक अदद पेन से ही त्रुटियाँ सुधारा करती थी। अब जमाना कंप्यूटर का है, तदनुसार हमें तकनीकी ज्ञान होना अति आवश्यक है। आज कई लेखक कंप्यूटर में टाइप करके हमें पांडुलिपियाँ दे देते हैं और हम उनमें प्रूफ लगाते हैं। लेकिन आज भी कई लेखक, विशेषकर बुजुर्ग लेखक या वो लेखक जो टेक्नो-फ्रÞेंडली नहीं हैं, हस्तलिखित पांडुलिपियाँ या बाहर किसी टाइपिस्ट से टाइप कराई गयी पांडुलिपियाँ देते हैं। जाहिर है एक टाइपिस्ट, साहित्य या भाषा का जानकार भी हो ये आवश्यक नहीं। इस दशा में वर्तनीगत अशुद्धियाँ होना स्वाभाविक हैं; और यहीं से शुरू होता है एक प्रूफ-रीडर का काम। वर्तनीगत अशुद्धियों में विराम-चिह्न, अनुस्वार, अनुनासिक आदि शामिल हैं। फिर कारक-चिह्नों में भी विकारों की भरमार पाई जाती है। अहिंदी-भाषी लेखकों के साथ-साथ हिंदी-भाषी लेखकों में भी वाक्य-विन्यास और संज्ञा के लिंग के ज्ञान का अभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

साहित्य संबंधी प्रूफ-रीडिंग को देखने के अपने दृष्टिकोण के बारे में कुछ बताइये?
व्योमा – दृष्टि गिद्ध की और कोण न्यायपूर्ण रहता है। मैंने कभी भी अपना काम करते समय किसी अन्य के दृष्टिकोण को आधार नहीं बनाया। अन्य की श्रेणी में मैं सरकारी महकमों, हिंदी के ठेकेदारों, सोशल मिडिया के धनी साहित्यकारों, हिंदी को आधुनिकता की ऊँचाइयाँ प्रदान करने वाली बिरादरी को रखती हूँ। मैंने सदा ही आदर्श, मानक और परंपरागत हिंदी, जो अज्ञेय जी की, हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की, भारती जी की रही है, की पैरवी की और उसे ही अपनाया है। जहाँ नुक़्ते की दरकार हो, लगाती हूँ। जहाँ चंद्रबिंदु लगता है, लगाती हूँ। पूर्णविराम को फुलस्टॉप से रिप्लेस नहीं करती। योजक-चिह्नों का यथास्थान प्रयोग करती हूँ। आजकल सेमी-कॉलन का इस्तेमाल करना लोग भूल ही चुके हैं, लेकिन मैंने सेमी-कॉलन का अस्तित्व आज भी जीवित रखा है। वक़्ते-जरूरत वाक्य-विन्यास, संज्ञा के लिंगों को सुधारना, पैराग्राफ बदलना आदि कार्य भी कर डालती हूँ। बस शैली जी, यही कुछ ऐसी बातें हैं जिससे मेरे द्वारा किया गया कार्य लेखक, पाठक और प्रकाशक देखते ही पहचान जाते हैं।

क्या प्रकाशक या लेखक के साथ कभी तनावपूर्ण पलों का सामना भी करना पड़ा?
व्योमा – जी बिलकुल, दोनों पक्षों के साथ जबरदस्त तनातनी के कई मौके आए। हमारे देश के हिंदी-साहित्यकारों के भाषा-ज्ञान के बारे में सधे शब्दों में कहूँ तो अस्सी प्रतिशत साहित्यकार अपनी हिंदी अपनी जेब में रखकर चलते हैं। इस जुमले और इस विषय को रेशा-रेशा बिखेरकर देखना मौजू होगा। यहाँ अकसर विदेशों के देखा-देखी हिंदी की श्रेष्ठता को आँकने का चलन बढ़ रहा है और बढ़ता ही चला जा रहा है। एक रोचक घटना का जिक्र करती हूँ। एक बार एक वरिष्ठ लेखक की पुस्तक मेरे पास एडिटिंग और प्रूफिंग के लिये आई। उन साहब ने ताउम्र मेरी भलाई के लिये बहुत-कुछ किया; जिसके लिये मैं उनकी तहे-दिल से शुक्रगुजार जरूर हूँ; लेकिन सिद्धांतों में मुआमले मैं कॉम्प्रोमाइज कर ही नहीं सकती। नहीं किया। तो, जो किताब मेरे पास आई, वह एक जीवनी थी। एक लेखिका होने के नाते शैली जी, आप बेहतर जानती होंगी कि जीवनी में फैक्ट्स एंड फिगर्स का क्या महत्त्व होता है। मैंने एडिटर और प्रूफ-रीडर की अपनी हद से आगे बढ़कर रीसर्च कर उस किताब के आँकड़े दुरुस्त किये, लेकिन साहित्यकार महोदय उखड़ चुके थे। अलावा इसके, काम करते वक़्त मैं स्तरीय वर्तनी का प्रयोग कर उन्हें व्हाट्सएप पर हर पल, जी हाँ! हर पल मैसेज भी भेज रही थी। चाहे वो रात के नौ बजे हों, बारह या फिर दो ही क्यूँ न बजे हों महोदय मैसेज-दर-मैसेज उखड़ते चले जा रहे थे।

अपने खट्टे-मीठे अनुभव पर कुछ प्रकाश डालिये?
व्योमा – ज्यादा वक़्त नहीं हुआ शैली जी, लेकिन मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे भारत के सर्वश्रेष्ठ लेखक बतौर क्लाइंट मिले। उदाहरण के लिये ढब्बू जी फेम आबिद सुरती जी मेरे पहले क्लाइंट रहे। जब मुझे उनके घर जाने का सौभाग्य मिला और मैंने उनका लेखन-कार्य देखा तो, मेरी हैरानी की सीमा न रही। मैंने उनकी कई ऐसी पुस्तकें देखीं जो उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में आती हैं; लेकिन पाठकों तक पहुँच ही नहीं पा रही हैं। कारण भिन्न-भिन्न थे। कई पुस्तकें ऐसी भी थीं जिनकी मात्र एक ही प्रति मौजूद थी और वो भी सिर्फ उन्हीं के पास। वहीं कई पुस्तकें ऐसी भी थीं जिनकी एक भी प्रति मौजूद न थी। मैंने उनकी पांडुलिपियाँ देखीं, जिनमें से कई पचास से अधिक वर्ष की उम्र रखती थीं तो कई गर्भ में ही जन्म लेने के लिये छटपटा रही थीं। मैंने उन्हें अपने लिटरेरी-एजेंट का कार्य शुरू करने के बारे में विस्तार से बताया तो उन्होंने एक पल की देरी किये बिना मेरी सेवाएँ लेना स्वीकार कर लिया; और उसी दिन से मेरा काम शुरू हो गया। सबसे पहले मैंने वो किताबें, जिनकी मात्र एक ही प्रति, हार्ड कॉपी में मौजूद थीं, उन्हें सहेजा, टाइप करवाया और उनकी वर्ड-फाइल बनाईं। फिर वो किताबें, जो सिर्फ सॉफ़्ट कॉपी यानी पीडीएफ में थीं, उन पर काम किया। फिर पांडुलिपियाँ सहेजीं। पुस्तकें एकत्रित करने के पश्चात उन्हें श्रेणीबद्ध किया। जैसे, उन्होंने रेड-लाइट एरिया पर बहुत लिखा है, तकरीबन सात उपन्यास वेश्या-जीवन पर उनके प्रकाशित हो चुके हैं; उन सातों किताबों का एक सेट तैयार हुआ। इसी तरह सामाजिक, प्रेम, डाकू-जीवन, हास्य, नाटक आदि विषयों को आधार बनाकर समग्र साहित्य को श्रेणीबद्ध किया गया। अब बारी आई समस्त अस्सी किताबों को कंप्यूटरिकृत फॉर्मेट में तब्दील करने की। चूँकि ये प्रोजेक्ट छोटा नहीं, अत: काम अभी अंडर पाइपलाइन है। -टाइपिंग, प्रूफिंग, एडिटिंग, कवर-पेज, भूमिका वगैरह-वगैरह का कार्य- पर्याप्त समय की माँग करता है। चंद किताबों के लिये लीगल कार्रवाई करने की भी आवश्यकता होगी। दो-चार सेट पूरे होते ही प्रकाशकों से डील करने का कार्य शुरू होगा। इस तरह एक लिटरेरी-एजेंट अपना कार्य करता है और इन समस्त कार्यों के लिये एक तयशुदा शुल्क लेखक से लेता है। आबिद जी के बाद अन्य लेखकों से भी मैंने बात की, अपनी सेवाएँ देने का प्रस्ताव रखा और ज्यादातर लेखक सहर्ष राजी भी हुए। पर हाँ, आबिद सुरती जी मेरे पहले क्लाइंट हैं।

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