वाशिंगटन। हार्वर्ड विश्वविद्यालय कम्युनिस्ट विचाराधारा का गढ़ माना जाता रहा है। फरवरी 2020 में वाल स्ट्रीट जर्नल व ब्लूमबर्ग में प्रकाशित सरकारी आंकड़ों के मुताबिक शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका के विश्वविद्यालयों पर चीन मेहरबान हो गया। अब यह खुलासा हुआ है कि चीन ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका की नाक के नीचे ही उसकी शिक्षा प्रणाली के रास्ते उसकी खुफिया जानकारी हासिल करने का मास्टर प्लान बना लिया है।
इसके तहत वह अमेरिका के हार्वर्ड समेत कई विश्वविद्यालयों को 6.5 बिलियन डॉलर का दान दे चुका है और इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। यही नहीं, इसी फंडिंग का फायदा उठाकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी इकलौती बेटी शी मिंगजी का दाखिला भी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में करवा लिया। भारत से सीमा विवाद के बाद अब यह साफ हो गया है कि चीन की साम्राज्यवादी नीति कोई नई नहीं है।
चीन नई चाल से दुनियाभर में पसार रहा पांव
1949 में कम्युनिस्ट शासन आते ही वह तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान (चीनी नाम शिंजियांग), दक्षिणी मंगोलिया, हांगकांग, मकाओ और ताइवान पर कब्जा जमा जा चुका है या अपना हिस्सा बताता है। भारत से सटी सीमा पर भी उसकी बुरी निगाहें किसी से छिपी नहीं है। लद्दाख के गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प उसी का परिणाम थी। अब चीन नई चाल से दुनियाभर में अपने पांव पसार रहा है। छोटे-छोटे विकासशील देशों को अधोसंरचना खड़े करने के लिए कर्ज दे रहा है।
अमेरिकी विश्वविद्यालयों को चीनी फंडिंग
फिर जब लोन सिर से ऊपर चला जाता है तो उस देश की संपत्ति ही हड़प लेता है। बता दें कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय कम्युनिस्ट विचाराधारा का गढ़ माना जाता रहा है। फरवरी 2020 में जारी वाल स्ट्रीट जर्नल की रपट के अनुसार अमेरिकी विश्वविद्यालयों को 2013 की शुरुआत से चीनी फंडिंग मिल रही है। यह वह दौर था जब शी जिंनपिंग ने चीन की बागडोर अपने हाथों में ली थी। इसके तहत 115 अमेरिकी कॉलेजों को चीन से करीब 6.5 बिलियन डॉलर दिए गए।
जून 2019 तक हार्वर्ड को चीन ने एक बिलियन डॉलर दिए
जबकि, ब्लूमबर्ग की यूएस डिपार्टमेंट आफ एजूकेशन के हवाले सेजारी रपट के अनुसार 2013 से लेकर जून 2019 तक हार्वर्ड को अलग-अलग बहाने से चीन ने एक बिलियन डॉलर दिए गए। इसका कोई हिसाब नहीं था। बात सिर्फ अनुदान, चंदा या उपहार तक ही नहीं रूकी। अमेरिका में पिछले एक दशक में चीनी छात्रों की संख्या तिगुनी हो गई। 2019 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राज्य में चीनी छात्रों की संख्या 3 लाख 70 हजार के आसपास है, जो यहां पढ़ने वाले कुल (10 लाख 95 हजार 299) विदेशी छात्रों की एक तिहाई संख्या है।
अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों का अनुपात 18 फीसद
इसके बाद भारत का नंबर आता है। अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों का अनुपात 18 फीसद है। यह लगातार चौथा साल था, जब यहां 10 लाख से ज्यादा विदेशी छात्र शिक्षा लेने के लिए पहुंचे थे। विदेशी छात्रों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को उस साल 44.7 अरब डॉलर (लगभग तीन लाख करोड़ रुपये) का मुनाफा हुआ था। जिंनपिंग ने इन्हीं फंडिंग के बूते अपनी इकलौती बेटी शी मिंगजी का दाखिला हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में करवाया। 2010 से 2014 के बीच मिंगजी ने पहले स्नातक और फिर स्नाकोत्तर की पढ़ाई भी इसी विश्वविद्यालय से पूरी की।
अपनी बेटी को वजह बनाकर विश्वविद्यालय जाते थे चीनी राष्ट्रपति
अपनी बेटी को वजह बनाकर चीनी राष्ट्रपति शी विश्वविद्यालय में आने-जाने लगे। यह दौरे कभी आधिकारिक तो कभी निजी होते थे। अपनी बेटी की पढ़ाई पूरी होने के बाद भी उनका हार्वर्ड से लगाव कम नहीं हुआ। हाल ही में उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष लॉरेंस बेको और उनकी पत्नी एडेल फ्लीट बेको के साथ भी मुलाकात की थी। जिंनपिंग के बाद चीन के कई शीर्ष नेताओं ने अपनी संतानों का दाखिला येल यूनिवर्सिटी में करवाया। बाद में उसे भी चीन से भारी अनुदान मिला।
रिचर्स पेपर चुराने के लिए सीक्रेट मिशन बनाता है चीन
अब सवाल यह उठता है कि आखिर चीन अमेरिका की यूनिवर्सिटिज में पानी की तरह पैसे बहा क्यों रहा था। दूसरे की जमीन को हड़पने वाला चीन बिना किसी स्वार्थ के हार्वर्ड और येल को अरबों रुपये उपहार में कभी नहीं देगा। इसके पीछे उसकी गहरी साजिश थी। दरअसल, चीन को पता है कि दुनिया के बेहतरीन शिक्षाविद यहां अध्ययन करते हैं, जिसके बाद वह पैसों के लालच के दम पर अमेरिका के ट्रेड सीक्रेट, गुप्त रक्षा तकनीक, रिचर्स पेपर चुराने के लिए एक सीक्रेट मिशन बनाता है।
विश्वविद्यालय में गुप्त भर्ती कार्यक्रम चलाते थे
चीन ने इन सूचनाओं को चुराने के लिए बाकायदा एक खास प्रोग्राम तैयार किया और इसके लिए भर्तियां भी कीं, जिसमें अमेरिकी मूल के लोगों को रखा गया, जो उसतक आसानी से ये जानकारी पहुंचा दें। इस साल की शुरूआत में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में केमिस्ट्री एंड केमिकल बायोलॉजी डिपार्टमेंट के चेयरमैन चार्ल्स लीबर की गिरफ्तारी इसी ओर इशारा करती है, जिन पर आरोप है कि वह विश्वविद्यालय में गुप्त भर्ती कार्यक्रम चलाते थे, दूसरे विभागों के शोधार्थियों को करोड़ों रुपये का लालच देकर चीन के लिए काम करने को राजी करते थे।
हार्वर्ड और येल जैसे यूनिवर्सिटिज में काम चीन के लिए होता था
यानी लैब और दिमाग भले ही अमेरिकी थे, लेकिन हार्वर्ड और येल जैसे यूनिवर्सिटिज में काम चीन के लिए होता था। ऋइक की माने तो 61 वर्षीय लीबर को चीन द्वारा एक महीने में 50,000 डॉलर यानी 38 लाख रुपये से भी ज्यादा का भुगतान किया गया था और चीनी विश्वविद्यालय में एक शोध प्रयोगशाला स्थापित करने के लिए 7.5 करोड़ से अधिक का पुरस्कार दिया गया था। यह सारी जानकारी उन्होंने यूएसए से छिपाई थी। चीन के इस गुप्त भर्ती कार्यक्रम में चार्ल्स लीबर के अलावा दो चीनी शोधार्थियों को भी गिरफ्तार किया गया है।





