लखनऊ। शहर के गुरुद्वारों में बैसाखी का पर्व श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस मौके पर गुरुद्वारों को रंगी बिरंगी झालरों और फूलों से सजाया गया। गुरुद्वारों में शबद-कीर्तन कर गुरुजी की महिमा का गुणगान किया गया। सिख संगत ने गुरुवाणी का पाठ किया। श्रद्धालुओं ने गुरुद्वारों में श्री गुरुग्रंथ साहिब जी के चरणों में मत्था टेका कर आशीर्वाद लिया और सुख-शांति और भाईचारे की कामना की। वहीं श्रद्धालुओं ने लंगर छका।
खालसा पंथ का साजना दिवस बैसाखी पर्व गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा नाका हिंडोला लखनऊ, में बड़ी श्रद्धा एवं पारम्परिक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। गुरुद्वारा साहिब का भव्य दीवान हाल बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया था, दीवान हाल के बीचो-बीच फूलों की और बिजली की झालरों से सुसज्जित सुंदर संगमरमर की पालकी साहिब में श्री गुरुग्रंथ साहिब का प्रकाश किया गया था। प्रात: काल से ही लखनऊ एवं आसपास के इलाकों से श्रद्धालु गुरुद्वारा नाका हिंडोला में पहुंचने लगे तथा पंक्तियों में खड़े होकर श्री गुरुग्रंथ साहिब के दर्शन के पश्चात अपना स्थान ग्रहण कर गुरबाणी का रस पान किया। श्री अखंड पाठ की समाप्ति के पश्चात हजूरी रागी भाई रविंदर सिंह ने अपनी मधुर वाणी में पवित्र आसा दी वार का अमृतमयी शबद कीर्तन गायन कर वातावरण को भक्ति रस से सराबोर और कर दिया।
ज्ञानी विनोद सिंह जी ने बैसाखी पर्व पर कथा व्याख्यान किया। विशेष रूप से पधारे हजूरी रागी भाई गुरप्रीत सिंह एवं गुरविंदर सिंह जी,श्री दरबार साहिब श्री अमृतसर वालों ने। खालसा मेरो रूप है खास,खालसे में हौं करो निवास।।
शबद कीर्तन गायन कर साथ संगत को निहाल किया। माता गुजरी सत्संग सभा एवं गुरमत संगीत अकैडमी गुरुद्वारा नाका हिंडोला लखनऊ के बच्चों ने भी संगतो को नाम सिमरन, शबद कीर्तन, गायन कर समूह साध संगत को भाव विभोर किया। अरदास के उपरांत उपस्थित श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन सरदार मनमीत सिंह एवं सरबजीत सिंह ने किया। गुरुद्वारा साहिब के अध्यक्ष डॉक्टर सरदार अमरजोत सिंह जी ने सभी नगर वासियों को बैसाखी पर्व पर हार्दिक बधाई दी तथा सिख संगठनों /जत्थेबंदियों एवं प्रशासन द्वारा को उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और हार्दिक आभार प्रकट किया। दरबार हाल की सजावट एवं संपूर्ण कार्यक्रम की व्यवस्था सरदार हरमिंदर सिंह (टीटू) सरदार दलजीत सिंह जी की देखरेख में हुआ। सिख सेवक जत्थे ने हर वर्ष की भाती इस वर्ष भी समूह संगत के जोड़ों (जूतो ) सेवा संभाली।
दोपहर के 12:30 बजे से गुरु का लंगर समस्त संगतो में वितरित किया गया। लंगर पकाने की सेवा सरदार रनजीत सिंह एवं उनके साथियों द्वारा की गई, लंगर वितरित करने की सेवा सिख यंग मैन एसोसिएशन एवं दशमेश सेवा सोसायटी व जन समाज सेवा संस्था के सदस्यों द्वारा की गयी। जल की सेवा श्री सुखमनी सेवा सोसायटी एवं अमृत सेवक जत्था लखनऊ द्वारा की गयी। दरबार हाल में (अनुशासन) की सेवा यूथ खालसा एसोसिएशन एवं दशमेश सेवा दल द्वारा की गई
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक एवं समाज सेवक नीरज सिंह ने भी गुरुद्वारा साहब में माथा टेका ओर समूह साध संगत को बैसाखी पर्व की हार्दिक बधाई दी कार्यक्रम को सफल एवं सुचारित रूप से चलाने में सरदार राजिंदर सिंह (पप्पू),सरदार दविंदर सिंह,सरदार आज्ञा पाल सिंह, अमनप्रीत सिंह, का विशेष सहयोग रहा।
गुरुद्वारा आलमबाग में सिक्खी वेषभूषा में सजे बच्चे, जीते पुरस्कार :
गुरुद्वारा आलमबाग में मंगलवार को खालसा साजना दिवस मनाया गया। इस मौके पर दशमेश पब्लिक स्कूल के बच्चों और सतबीर सिंह ने कीर्तन कर संगत को निहाल किया। हेड ग्रंथी ने बैसाखी पर खालसा साजनां दिवस के इतिहास के बारे में बताया। यहां पर सिक्खी बाना में बच्चों को प्रतियोगिता हुई। जिसमें बच्चों ने सुंदर सिक्खी वेषभूषा धारण कर आये।
गुरुद्वारा मानसरोवर में सजा विशेष दीवान, भक्तों ने चखा लंगर
लखनऊ। गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा मानसरोवर गुरु तेग बहादर नगर एलडीए कॉलोनी कानपुर रोड लखनऊ में बहुत ही श्रद्धा से मनाया गया। अध्यक्ष सरदार सम्पूरन सिंह बग्गा एवं महासचिव चरणजीत सिंह एवं सचिव गगनदीप सिंह बग्गा एवं कोषाध्यक्ष अमरजीत सिंह (पम्मी),परमजीत चन्दर,वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरिंदर बग्गा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष इकबाल सिंह ने संगतो को खालसा साजना दिवस पर बधाई दी । शाम के दीवान की समाप्ति उपरांत गुरु का लंगर अटूट वितरित किया जायेगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने खालसा साजना दिवस को बहुत ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया।
खालसा साजना दिवस पर अध्यक्ष सरदार सम्पूरन सिंह बग्गा ने बताया कि दीवान की आरंभता अमृत वेले से नितनेम के पाठ , सुखमनी साहिब जी के पाठ के साथ हुई एवं हजूरी रागी भाई हरविंदर सिंह जी ने आशा दीवार के कीर्तन किये।और हैड ग्रंथि ज्ञानी परमजीत सिंह जी संगत को खालसा साजना दिवस के इतिहास के बारे में बताया।
वर्ष 1699 की बैसाखी के पावन दिवस के अवसर पर श्री आनंदपुर साहिब की पावन धरती पर साहिब श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने उपस्थित समूह में मुख्य पंडाल पर आकर सिर की मांग की और कहा, ‘है कोई गुरु का प्यारा जो गुरु के लिए अपना सिर दे सके ‘पूरे पंडाल में सन्नाटा छा गया तभी एक एक करके देश के विभिन्न हिस्सों से आए भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह, भाई साहेब सिंह ने एक-एक करके अपना शीश दिया और गुरु महाराज ने सबके समक्ष उनका सिर काट कर उन्हें पुन: जीवित कर, उन्हें अमृत छकाया।
इस प्रकार से गुरु महाराज ने उस दिन सिख समाज से जात- पात , वर्ण, संप्रदाय, ऊंच-नीच का समस्त भेदभाव मिटा दिया तथा देश एवं धर्म के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देने का अदम्य साहस उनमें भर दिया।
गुरु महाराज ने भी पांच प्यारों से अमृत की अपेक्षा की ,सभी पांच प्यारे बोले कि हमने सिर देकर अमृत प्राप्त किया है आप क्या देंगे तब गुरु महाराज ने कहा कि मैं अपना पिता तो देश परिवार के लिए पहले ही दे चुका हूं आने वाले समय में अपनी मां एवं पुत्रों के साथ सर्वस्व न्योछावर करूंगा । तब पांच प्यारों ने गुरु गोविंद सिंह महाराज को अमृत छकाया है। गुरु गोविंद सिंह गोविंद राय से गोविंद सिंह बने हैं । उसी दिन गुरु महाराज ने सिख पुरुषों के लिए सिंह अर्थात शेर तथा सिख महिलाओं के लिए कौर अर्थात राजकुमारी का उपनाम जोड़ने की आज्ञा की एवं एक ऐसा पंथ तैयार किया जो सरबत के भले के लिए कार्य करें। और हजूरी रागी भाई हरविंदर सिंह जी ने शब्द कीर्तन किया। वही सम्पूरन सिंह बग्गा जी ने यह भी बताया की हजूरी रागी भाई हरविंदर सिंह जी शब्द कीर्तन करते हुए शाम के दीवान की समाप्ति रात्री 9 बजे करेंगे।
खालसा सजना दिवस पर श्रद्धालुओं ने किया अमृत संचार
लखनऊ। ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब यहियागंज में आज खालसा सजना दिवस (वैसाखी) के पावन अवसर पर अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और धार्मिक उमंग के साथ भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रात:काल 5 बजे से ही गुरुद्वारा साहिब में दीवान आरंभ हो गया, जिसमें बड़ी संख्या में संगत ने उपस्थित होकर गुरुबाणी का आनंद प्राप्त किया।
कार्यक्रम की शुरूआत नितनेम पाठ से हुई, जिसके उपरांत ज्ञानी परमजीत सिंह ने अत्यंत श्रद्धा के साथ सुखमनी साहिब का पाठ किया। इसके पश्चात वातावरण गुरुमय हो उठा जब भाई कर्नेल सिंह ने मधुर स्वर में आसा की वार का कीर्तन प्रस्तुत किया। संगत ने भाव-विभोर होकर कीर्तन का रसास्वादन किया। दीवान के दौरान ज्ञानी जगजीत सिंह जाचक ने खालसा सजना दिवस एवं वैसाखी के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तृत और प्रेरणादायक कथा प्रस्तुत की। उन्होंने संगत को वर्ष 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा श्री आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की ऐतिहासिक घटना का विस्तार से वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि किस प्रकार गुरु साहिब ने सिर चाहिए की पुकार लगाकर पांच वीरों को चुना, जिन्हें इतिहास में ह्लपंज प्यारेह्व के रूप में जाना जाता है— भाई दया सिंह, भाई धरम सिंह, भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह और भाई साहिब सिंह। कथा में इन पांचों के संक्षिप्त जीवन-परिचय को भी अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया।
ज्ञानी जाचक जी ने आगे बताया कि खालसा पंथ की स्थापना के बाद भारतीय समाज में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया—जाति-पाति, ऊंच-नीच और भेदभाव की दीवारें टूटने लगीं तथा साहस, समानता और धर्म की रक्षा के लिए खड़े होने की भावना का विकास हुआ। खालसा ने न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी भारत को नई दिशा प्रदान की।
आज के इस पावन अवसर पर गुरुद्वारा साहिब में 48 श्रद्धालुओं ने अमृतपान कर खालसा पंथ में प्रवेश किया। अमृत संचार के उपरांत ह्लजो बोले सो निहाल, सत श्री अकालह्व के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा और सभी नवदीक्षित सिखों का संगत द्वारा जोरदार स्वागत किया गया। गुरुद्वारा प्रबंधन में परमजीत सिंह पम्मी गुलशन जोहर जी एवं दलजीत सिंह ने लंगर की सेवा एवं व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित किया। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने गुरु का लंगर ग्रहण किया। समारोह के अंत में डॉ. गुरमीत सिंह ने सभी संगतों, सेवदारों एवं आगंतुकों का धन्यवाद व्यक्त किया और खालसा पंथ के सिद्धांतों पर चलने का संदेश दिया।
इसके अतिरिक्त, तेजेंद्र सिंह तलवार परिवार द्वारा अखंड पाठ साहिब की संपूरणता करवाई गई, जिससे पूरे वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ। वहीं सतनाम सिंह सेठी परिवार ने अपने परिवार में नवजात बच्चों के नामकरण संस्कार भी आज के इस पवित्र दिन पर संपन्न करवाए। इस प्रकार खालसा सजना दिवस का यह आयोजन न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक एकता, सेवा भावना और गुरमत विचारधारा के प्रसार का भी सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ।
बैसाखी का सांस्कृतिक महत्व:
बैसाखी का पर्व भारतीय समाज में एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से कृषि प्रधान समाज के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बैसाखी के दिन नई फसल की कटाई होती है। किसानों के लिए यह दिन खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक होता है, क्योंकि उन्हें अपनी मेहनत का फल मिल रहा होता है। खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में यह पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन को किसान अपनी नई फसल की खुशहाली के रूप में मनाते हैं, और पारंपरिक तरीके से खेतों में काम करते हुए ढेर सारी खुशियां मनाते हैं। इसके साथ ही, बैसाखी का पर्व सामूहिक उत्सव का रूप भी धारण करता है। समाज के लोग एक साथ मिलकर नृत्य, संगीत और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।





