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कौन समझेगा विरोध का नफा-नुकसान

समर्थन और विरोध लोकतंत्र की दो आंखें हैं। एक भी आंख कमजोर हो तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। उस रूप में नहीं दिखता, जैसा कि उसे दिखना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती के लिए दोनों का वजूद जरूरी है। केवल समर्थन ही हो तो भी बात नहीं बनती और केवल विरोध ही हो तो भी बात नहीं बनती। स्वामी विवेकानंद का एक लेख है- ‘सेक्रेट ऑफ दि वर्क।’ अर्थात कर्म का रहस्य।

इसमें उन्होंने कहा है कि पैर में चुभे एक कांटे को निकालने के लिए दूसरे कांटे की जरूरत होती है लेकिन एक कांटे को निकालकर दूसरे कांटे को पैर में छोड़ दिया जाए तो क्या दर्द कम हो जाएगाँ बिल्कुल नहीं। घटेगा नहीं, अपितु बढ़ जरूर जाएगा। उसी तरह बुराई को अच्छाई रूपी कांटे से निकालो लेकिन अच्छाई को भी अपने शरीर और मन पर हावी न होने दो। केवल हमीं अच्छे हैं, दूसरे अच्छे नही हैं। हमीं ईमानदार हैं, दूसरे सब बेईमान है, इस अवधारणा का स्वागत नहीं किया जा सकता।

भारतीय राजनीति में ऐसा ही कुछ चल रहा है। सत्तापक्ष हो या विपक्ष उनके आरोप-प्रत्यारोप का स्तर लोकतंत्र की मजबूती का अहसास नहीं कराता। निंदक नियरे राखिए का भाव तो राजनीति के आंगन से कब का तिरोहित हो चुका है। छोटे-छोटे मुद्दों पर अगर हिंसक आंदोलन हो रहे हैं तो उसके मूल में भी कहीं न कहीं अहं ब्रह्मास्मि का भाव भी प्रमुख है। नागरिकता संशोधन कानून पर देश भर में बवाल हुआ। पुलिस पर पथराव हुआ। सरकारी संपत्तियोंको नुकसान पहुंचाया गया। उन्हें आग के हवाले किया गया। उत्तर प्रदेश के कई शहर पिछले कई दिनों से विरोध की आग में जल रहे हैं। विरोध का मोहरा अल्पसंख्यक वर्ग, यहां तक कि छात्रोंको भी बनाया गया। उत्तर प्रदेश में अब तक 15 लोग इस आंदोलन की भेंट चढ़ चुके हैं। कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

बड़ी बात कि कुछ राजनीतिक दलों ने भी नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालोंका साथ दिया। उनके आंदोलन के साथ खड़े रहने की बात कही। कुछ ने विरोध मार्च किया। कोई इंडिया गेट पर पहुंचा लेकिन जलते हुए देश और प्रदेश को बचाने के जो जद्दोजहद होनी चाहिए थी, उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। विरोध की आंधी में देश और प्रदेश का हित गौण हो गया। किसी ने नागरिकता कानून पर संयुक्त राष्ट्रसंघ से जनमत संग्रह कराने की अपील कर डाली तो किसी ने इस विचारधारा को खारिज और आलोचित करना ही अपना धर्म समझा। कोई नागरिकता कानून के समर्थन में उतर रहा है और कोई विरोध में। गनीमत है कि माहौल कुछ सामान्य हो रहा है लेकिन इस चक्कर में अब तक कितना नुकसान हो चुका है, इसकी शायद कोई कल्पना भी नहीं कर रहा है।

आंदोलन की धार कुंद पड़ने से पहले ही सरकार ने उपद्रवियों की धरपकड़ शुरू हो गई है। मामले अदालतों तक पहुंचने लगे हैं। पैरोकार जज के घर तक दस्तक देने लगे हैं। यूपी केमुख्यमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि कोई भी उपद्रवी बख्शा नहीं जाएगा। उनकी संपत्ति जब्त कर नुकसान की भरपाई की जाएगी। सरकारी संपत्ति के नुकसान की भरपाई तो फिर भी हो जाएगी लेकिन छात्रों, व्यापारियों और आम आदमी को हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी? उत्तर प्रदेश में सैकड़ों उप्रवी पकड़े जाचुके हैं। लखनऊ में कुर्की की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। उपद्रव में शामिल एक दुकानदार की दुकान सील कर दी गई है। उसे एक सप्ताह में एक लाख 72 हजार रुपये जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं। शेष अन्य उपद्रवियों पर भी देर-सबेर कार्रवाई संभव है।

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