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विभुवन संकष्टी व्रत कल, ढाई साल बाद बन रहा विशेष संयोग

लखनऊ। हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गणपति बप्पा की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही विधिपूर्वक व्रत भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन गणेश जी की पूजा करने से सभी विघ्न दूर होते हैं और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ (अधिक) माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत 03 जून को रात 09 बजकर 21 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 04 जून को रात 11 बजकर 30 मिनट पर होगा। ऐसे में 03 जून को विभुवन संकष्टी चतुर्थी मनाई जाएगी। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है. पंचांग के अनुसार, अधिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विभुवन संकष्टी कहा जाता है. इसलिए इस संकष्टी चतुर्थी का संयोग प्रत्येक ढाई साल पर बनता है. चूंकि, यह चतुर्थी पुरुषोत्तम मास में पड़ती है, इसलिए इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। दृक पंचांग के अनुसार, इस साल ज्येष्ठ में विभुवन संकष्टी का व्रत तीन जून को बनने जा रहा है. इस दिन बुधवार होने की वजह से इस व्रत का प्रभाव और अधिक शुभ प्राप्त होगा। शास्त्रों के अनुसार, विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने से हर प्रकार कष्टों से मुक्ति मिलती है. इसके अलावा यह व्रत मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत खास माना गया है।

विभुवन संकष्टी का धार्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार विभुवन संकष्टी का व्रत करने से भगवान गणेश शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं। यह व्रत मानसिक, शारीरिक और आर्थिक समस्याओं से मुक्ति प्रदान करता है। विभुवन संकष्टी भगवान गणेश को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। संकष्टी का अर्थ है संकटों से मुक्ति। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक गणेश जी की पूजा करने से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

विभुवन संकष्टी के दिन ध्यान रखें ये बातें
गणेश जी की पूजा के दौरान उन्हें जल, रोली, चंदन, लाल फूल अर्पित करें। व्रत कथा का पाठ करें। मंत्रों का जप करें। अन्न-धन समेत आदि चीजों का दान करें। प्रिय मोदक या तिल के लड्डुओं का भोग अवश्य लगाएं। व्रत के दौरान फल, दूध, साबूदाना या कुट्टू के आटे से बनी चीजों का सेवन करें। संकष्टी चतुर्थी का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक रात में चंद्रमा के दर्शन न कर लिए जाएं। व्रत के दौरान मन शांत रखना चाहिए। किसी पर क्रोध न करें, विवाद से बचें ब्रह्मचर्य के नियम का पालन करना चाहिए।

विभुवन संकष्टी पर कैसे करें गणेशजी की पूजा
विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने के लिए सबसे पहले इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गणपति का ध्यान करते हुए संकल्प लें. इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. मूर्ति स्थापना के बाद मंत्रों से गणपति का आवाहन करें. जब गणपति का आवाहन कर लें, तो उन्हें पंचामृत स्नान कराएं. इस दौरान ‘गणेशाय नम:’ इस मंत्र का जाप करते रहें. गणपति को पंचामृत स्नान कराने के बाद उन्हें दूर्वा, अक्षत फूल, फल और विशेष मिष्ठान (नारियल के लड्डू) इत्यादि अर्पित करें. इसके बाद अथर्वशीर्ष का पाठ करें या उनके मंत्रों का जाप करें. मंत्र जाप के बाद व्रत कथा का पाठ करें. पूजन के अंतिम चरण में घी या कपूर जलाकर आरती करें और उसे पूरे घर में दिखाएं. इस विधि से विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पूजा करने से हर प्रकार की मनोकामना पूर्ण होगी और कष्ट दूर होंगे.

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