लखनऊ। संस्कृति मंत्रालय,भारत सरकार एवं संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश के सहयोग से रंगयात्रा, लखनऊ द्वारा मुंशी प्रेमचंद जी कि जयंती के अवसर पर आपकी लिखी कहानी दो बैलो की कथा का मंचन अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संसथान में सायं काल किया गया इस कहानी का नाट्य निरूपण, परिकल्पना एवं निर्देशन ज्ञानेश्वर मिश्र ज्ञानी का था। यह कहानी सांकेतिक भाषा में यह संदेश देती है कि चाहे इंसान हो या कोई भी प्राणी, आजादी उसके लिए बहुत जरूरी है। आजादी हासिल करने के लिए अगर लड़ना भी पड़े तो बिना झिझक लड़ना चाहिए। स्वतंत्रता हर किसी का जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे बरकरार रखना हर किसी का कर्तव्य है।
कहानी दो बैल हीरा और मोती की है जिनको झूरी ने बड़े ही प्यार से पाला था। एक बार किसी कारणवश झूरी को उन बैलों को अपने ससुराल में साले गया के पास छोड़ना पड़ता है। लेकिन हीरा और मोती को लगता है कि उनके मालिक ने उन्हें गया को बेच दिया है, इसलिए वे जल्दी से उसके चंगुल से छूट के अपने घर जाना चाहते थे। रात को जब गया उन्हें चारा देके सो जाता है तब वें दोनों रस्सी तोड़ के झूरी के पास आ जाते है। उन्हें देख के झूरी बहुत खुश होता है लेकिन उसकी पत्नी को बहुत गुस्सा आता है और वह उन्हें कामचोर समझती है। वह उन दोनों बैलों को पुन: गया के हवाले कर देती है। दूसरी बार जब गया उन्हें फिर ले के जाता है तो उनपर अति क्रोधित होने के कारण उन्हें बहुत सताने लगता है। उन्हें खाना – पीना देना बंद कर देता है और जो कुछ देता भी था उसे वह न तो ढंग से खाते और न ही हल चलाते थे। गया अपने बैलों को अच्छे चारे डालता और हीरा मोती को सिर्फ भूसी खाने को दे देता था। उस घर में एक छोटी बच्ची जो उन्हें कुछ रोटियां खिलाती थी, एक रात उनको खोल देती है ताकि वो दोनो उस कैद से भाग जाएं। रस्ते में उनकी मुलाकात सांड से होती है वे दोनों उसको मिलकर हारते है और आगे बढ़ते हैं । वे दोनों काफी देर दौड़ने के बाद एक अनजान जगह पहुंच जाते है और वहां मटर के खेत में हरे भरे मटर खाने लगते है। उतने में कुछ लोग उन्हें घेर लेते है और काँजीहौस में कैद कर देते है। काफी दिन वहां भी अनेकों यातनाओं को सहने के बाद उनको एक कसाई के हाथों बेच दिया जाता है। उसके साथ चलते-चलते जब वे अपने घर के रास्ते को पहचान लेते है तो वो दौड़ते हुए झूरी के पास पहुंचते है और झूरी की पत्नी भी उन्हें प्यार से चूम लेती हैं । गया को भी अपनी गलती का पछतावा होता है ।
मंच योगेन्द्र पाल, मुकुल कुमार गुरुदत्त पांडेय, अनिल कुमार, मनोज वर्मा, अजहर जमाल, अभिषेक कुमार, डॉ मधु प्रकाश श्रीवास्तव,रीमा वर्मा, निरुपमा गुप्ता, लता बाजपेयी, अंशिका सक्सेना, सुरुचि सक्सेना ने सशक्त अभिनय किया । मंच परे प्रकाश – तमाल बोस,आॅर्गन वादन – लाल धर , ढोलक वादन एवं गायन – कवलजीत सिंह, मुखसज्जा – राज किशोर पप्पू, वेशभूषा – रीमा वर्मा,प्रस्तुति सहयोग – प्रियंका भारती, मीडिया प्रभारी – आदित्य मिश्रा का था ।





