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‘नृत्य’ नाटक ने दिया संदेश प्रकृति में मृत्यु जीवन का है प्रारंभ

यायावर रंगमंडल की ओर से नृत्य नाटक का प्रदर्शन पुनीत मित्तल के निर्देशन में बली आॅडिटोरियम में प्रभावी रूप में किया गया

लखनऊ। यायावर रंगमंडल की ओर से नृत्य नाटक का प्रदर्शन गुरुवार 12 मार्च को पुनीत मित्तल की कुशल परिकल्पना और निर्देशन में कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली आॅडिटोरियम में किया गया। यह प्रस्तुति 45 दिवसीय डांस थिएटर वर्कशॉप के तहत तैयार की गई है। यह कार्यशाला मोहम्मद हफीज के निर्देशन में संचालित की गई जबकि आद्या घोषाल क्रिएटिव असिस्टेंट रहीं। संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित इस प्रस्तुति के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ.संदीप कुमार को आमंत्रित किया गया था।
नृत्य एक इंडो-कंटेम्पररी डांस थिएटर प्रस्तुति थी, जो प्रकृति के भीतर चल रहे जीवन, संघर्ष और संतुलन के शाश्वत चक्र को मंच पर मूवमेंट और शारीरिक अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रभावी रूप में पेश की गई। खास बात यह रही कि इस प्रस्तुति में संवाद नहीं थे पर कलाकारों के लयात्मक शारीरिक भंगिमाओं ने, मौन कथ्य को भी प्रभावी रूप से सम्प्रेषित किया। निर्देशक की वृहद परिकल्पना ने इसमें नृत्य, संगीत और अभिनय की त्रिवेणी को रचनात्मकता के साथ मंच पर साकार किया। कहानी की शुरूआत जल के जन्म से होती है जिसमें हिमखंड के पिघलने से बहता हुआ पानी जीवन का आधार बनता है और उसी से एक पूरा संसार जन्म लेता है। इसी संसार में मछली, हिरण और बाज जैसे जीव अपने-अपने अस्तित्व और प्रकृति के नियमों के साथ जीते दिखाई देते हैं। उत्तरोत्तर मंच पर इन पात्रों के बीच परस्पर संबंध बनते हैं। इन संबंधों का परिणाम कभी सौंदर्य, कभी प्रेम, कभी भय तो कभी संघर्ष होता है। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया कि प्रकृति में हर जीव किसी न किसी पर निर्भर है। भूख, भय और जीवन की जद्दोजहद के बीच संघर्ष जन्म लेता है। इसी संघर्ष में मृत्यु भी आती है। मछली, हिरण और अंतत: बाज भी अपने जीवन चक्र को पूरा करते हैं। यह भी शाश्वत सत्य है कि प्रकृति में मृत्यु अंत नहीं बल्कि एक नए रूप में जीवन का प्रारंभ बन जाती है। मंच पर यह रूपांतरण तब दिखाई देता है जब मृत्यु के बाद वही जीव, वृक्ष बन जाते हैं। जिस हिरण का शिकार बाज करता था, वही वृक्ष बाद में बाज का आश्रय बन जाता है। इस तरह प्रस्तुति यह बताती है कि प्रकृति में सब कुछ एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म का यह अनंत चक्र निरंतर चलता रहता है। अंतिम दृश्य में सभी रूप यथा जल, जीव और वृक्ष एक साथ उभरते हैं और यह संकेत देते हैं कि जीवन का यह नृत्य, कभी समाप्त नहीं होगा। रूप बदलते रहेंगे लेकिन अस्तित्व का प्रवाह निरंतर चलता रहेगा। इसी अनंत चक्र को प्रकृति के शाश्वत नृत्य के रूप में अत्यंत प्रभावी रूप में पेश किया गया।
इस प्रस्तुति में खासतौर से प्रयुक्त समकालीन हिंदी कविता के अत्यंत विशिष्ट कवि, नरेश सक्सेना की पुस्तक एक अनाम पत्ती का स्मारक की कविता के माध्यम से इस कथ्य को बेहद ही नाटकीय और लयात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया। इसमें इंडियन कंटेंपरेरी गतियों और शारीरिक रंगमंच की तकनीक के साथ लयात्मक संरचना और मंचीय व्याकरण का सुंदर संगम देखने को मिला। भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों और रंगमंचीय तत्वों के संयोजन ने न केवल आगंतुकों को आनंदित किया बल्कि एआई के कृत्रिम दौर में मौलिकता और नवीनता का भी अहसास करवाया।
जनसंपर्क प्रभारी कीर्ति प्रकाश और पुष्पलता के अनुसार इसमें मंच पर मछली का किरदार प्रेरणा विश्वकर्मा, चील का प्रियम यादव, हिरण का वंशिका शर्मा, जल का विनय गुज्जर, सूत्रधार का पात्र, आद्या घोषाल ने अदा कर प्रशंसा हासिल की। दूसरी ओर मंच परे प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन का दायित्व मोहम्मद हफीज, मंच व्यवस्था का सुश्रुत गुप्ता और गरिमा यादव, संगीत संकलन एवं संचालन का हर्षिता बंसल, वेशभूषा का इब्रा परवीन और रूपसज्जा का दायित्व मनोज वर्मा ने निभाया।

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