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बाबाओं के पाखंड को उजागर कर गया ‘ज्योतिष का चमत्कार’

लखनऊ। यायावर रंगमण्डल की ओर से नाटक ज्योतिष का चमत्कार का मंचन किया गया। गोमतीनगर स्थित संगीत नाटक अकादमी के वाल्मीकि रंगशाला प्रेक्षागृह में मंचित यह नाटक ज्योतिषियों और बाबाओं के पाखण्ड़ से समाज में पनपते अन्धविश्वास को उजागर कर गया।
संजय अपने दोस्तों के साथ रामलीला में होने वाले नाटक की रिहर्सल में जुटा हुआ है। इसी बीच संजय के दादा जी की तबियत खराब हो जाती है। और एक सड़क छाप ज्योतिष दादा जी को बता देता है कि उनकी जीवन लीला बहुत ही जल्द समाप्त होने वाली है। दादा जी को ज्योतिष विद्या पर अटूट विश्वास है इसीलिए वह उस सड़क छाप ज्योतिषी की बातों को सच मान बैठते है। यह बात जब संजय के दोस्त रमेश को मालूम होती है तो वह संजय के साथ मिलकर एक नाटक रचता है और वह खुद एक ज्योतिषी बाबा का भेष बनाकर दादा जी के पास आता है। फिर वह दादा जी को अपनी बातों से वशीभूत कर उनको बताता है कि आपकी उम्र बहुत लम्बी है आप सौ वर्षों तक जियेंगे। दादा जी उसकी बातों से प्रसन्न हो उठते है और अपने आप को बिल्कुल भलाचंगा महसूस करने लगते है फिर रमेश अपने दोस्तों के साथ अपना राज खोलता है, और तब दादा को इस बात का अहसास होता है कि हमें सड़क छाप ज्योतिषियों और बाबाओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए और अपने जीवन में अन्धविश्वास को जगह नहीं देनी चाहिए।
सेंट पीटर स्कूल में 40 दिन तक चली बाल रंगमंच कार्यशाला में तैयार इस नाटक में अराध्या पाण्डेय, अनमोनल मित्तल, मान्या सिंह, ईशानी कनौजिया, अक्षता मिश्रा, ईशानी रावत, अभिनव सिंह, दामिनी, मान्या सिंह, पियूष कुमार, भाव्या चकवर्ती आदि ने अपने अभिनय कला से दर्शकों से खूब तालियाँ बटोरी। प्रकाश परिकल्पना सचिन मिश्रा, मंच व्यवस्था अनूप कुमार सिंह, मंच संचालन का रहा।

अच्छा इंसान बनने की नसीहत दे गया ‘थैंक्यू बच्चों’
इसी कड़ी में बाल कलाकारों ने थैंक्यू बच्चों का मंचन किया। नाटक के कथानुसार दादी जी रिया और यश को बहुत प्यार करती है, और उन्हें अच्छी बातों की शिक्षा देत्ती रहती हैं। वहीं दूसरी ओर रिया और यश की मम्मी (मान्यता) दादी जी से अच्छा व्यवहार नहीं करती हैं। यह अपनी सास के साथ नौकरानी जैसा बरताओ करती हैं, और उनके खिलाफ अपने पति (रोहित) के कान भरती रहती हैं। सोने पर सुहागा तो उस समय होता है जब मान्यता की सहेली (स्वाती) उससे मिलने आती है। वह पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित नई विचार धारा की युवती हैं। वह मान्यता को समझाती है कि बूढ़ा को कहां तक झेलोगी इन्हें तुम ‘ओल्ड एज होम’ भेज दो। मान्यता अपनी सहेली की बातों से सहमत हो जाती है और रोहित को समझाती है कि मां जी को हमे ‘ओल्ड एज होज’ भेज देना चाहिए। जब यह बात रिया और यश को पता चलती है तो वह दोनो इस बात को लेकर बेहद परेशान होते है। और यह अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपने मम्मी पापा को सबक सिखाने के उद्देश्य से उनके साथ वैसा ही व्यवहार करते है जैसे कि वह उनकी दादी के साथ करते रहे हैं। मम्मी पापा अपने बच्चों के व्यवहार से स्तब्ध हो जाते है, और गहरा धक्का लगता है, और अब उन्हें इस बात का एहसास होता है, कि वह जो बच्चों की दादी के साथ कर रहे थे, और उनके प्रति जो उनकी सोच थी वह कितनी गलत थी। मान्यता और रोहित अपने बच्चो को थैंक यू बोलते है कि बच्चों ने समय रहते उनकी आँखे खोल दी। बच्चों का पहला स्कूल उनका घर परिवार होता है और माता पिता उनके पहले शिक्षक होते हैं। हमें अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्य और अच्छे संस्कार बचपन से ही सिखाने चाहिए ताकि बच्चें बड़े होकर एक अच्छा इंसान और एक अच्छा नागरिक बन सकें। नाटक में अहम भूमिका इशानी कनौजिया, अक्षता मिश्रा, सानवी वर्मा, भव्या चक्रवर्ती, आराध्या, दामिनी, मान्या सिंह, अचिनत्य सिंह आदि ने निभायी।

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