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शहर की महिला रंगकर्मियों ने बनाई पहचान, थिएटर से तय किया स्क्रीन का सफर

लखनऊ। रंगमंच सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रतिभा है और यह चेहरा नहीं किरदार देखता है। महिलाओं को इसे आत्मसात करके मंच तक पहुंचने में समय जरूर लगा, लेकिन अपनी भागीदारी बराबरी और कहीं उससे भी ज्यादा सुनिश्चित की। एक समय था जब नाटक व फिल्मों में महिलाओं के किरदार पुरुष निभाते थे। महिलाओं के लिए रंगमंच में कोई स्थान नहीं था, लेकिन समय के साथ उन्होंने समाज के बाकी क्षेत्रों के साथ रंगमंच में भी अपने आप को साबित किया है। आज वो रंगमंच को सिर्फ मनोरंजन न मानकर एक करियर के तौर पर चुन रही हैं। शहर की कई ऐसी महिलाएं व युवा रंगकर्मी हैं, जिन्होंने खुद के साथ रंगमंच को भी नए आयाम दिए।

रास्ता मिला, मंजिल दूर है:

थिएटर से फिल्मों तक का सफर करने वाली सिमरन निशा ने बताया कि रंगमंच ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है। थिएटर की एक कार्यशाला से अपनी शुरूआत करने वाली सिमरन ने अपना पहला नाटक हसीना मान जाएगी लखनऊ फेस्टिवल में किया। उनकी अदाकारी को देखकर सभी बड़े रंगकर्मियों ने उनकी सराहना की। इसके बाद उन्होंने सैंया भहे कोतवाल, इयोडीपस, तुगलक, सिकंदर, नारी जैसे नाटकों में काम किया। रंगमंच के साथ टीवी और फिल्मों में अपनी अदाकारी के जलवे बिखेरे। नवाजुद्दीन के साथ फिल्म बाबू मोशाय बंदूकबाज व अजय देवगन की फिल्म रेड में वह बड़ी स्क्रीन पर नजर आईं। फिल्म मुल्क, छोटे नवाब में काम किया। टीवी पर धारावाहिक घूमती नदी के अलावा कई शॉर्ट फिल्म और विज्ञापन किए। वह बताती हैं कि रास्ता तो मिल गया, लेकिन मंजिल अभी दूर है।

एक सूत्र में जोड़ता है थिएटर:

पिछले लगभग 15 वषों से रंगमंच कर रही रंगकर्मी दीपिका बोस श्रीवास्तव ने 50 से ज्यादा नाटकों में काम किया। उनके पिता प्रभात कुमार बोस और मा अचला बोस ने भी रंगमंच में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। माता-पिता की प्रेरणा से दीपिका ने भी रंगमंच पर अपनी एक खास पहचान बनाई है। रंगमंच के प्रति उनकी दीवानगी को देखकर उनके पति निखिल कुमार श्रीवास्तव भी रंगमंच से जुड़ गए। उन्होंने वर्ष 2004 में नाटक पर्दा उठने से पहले में काम किया। उसके बाद एंटीगिनी, तुगलक, जायज हत्यारे, दुलारी बाई, अंडर सेक्रेट्री, सराय की मालकिन, दिल्ली ऊंचा सुनती है जैसे नाटक में काम किया। रंगमंच के साथ उन्होंने टीवी पर कई शो किए। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला स्वास्थ्य मिशन के छह एपिसोड के अलावा, क्त्राइम पेट्रोल, सावधान इंडिया, दास्तान-ए-जुर्म में कई एपिसोड किया। वह बताती हैं कि रंगमंच से बहुत लगाव है, थिएटर एक घर जैसा है, यह सभी को जोड़ता है।

बचपन से है अभिनय का शौक:

युवा रंगकर्मियों में से माही त्रिपाठी ने बहुत कम समय में अपनी एक खास पहचान बनाई है। शहर के अलावा बाहर मंचित कई नाटकों में उन्होंने शानदार अभिनय किया है। प्रवीन चंद्रा की जोश थिएटर से जुड़कर अभिनय की शुरूआत की। माही ने पहला शो वर्ष 2014 में पंचलाइट किया, जिसमें उन्होंने काकी का किरदार निभाया। उसके बाद राजा एक कथा, पंचायत, यथा राजा, चरनदास चोर, कमला, मुनिया एक मासूम, अदालत, हमसफर, ढोंग, द परफेक्ट पिक्चर जैसे नाटकों में अभिनय कर चुकी हैं। माही ने बताया कि रंगमंच ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया है। वह अब टीवी और फिल्मों की ओर रुख कर रही हैं। कुछ प्रोजेक्ट पर बात चल रही है, लेकिन रंगमंच में जुड़ी रहूंगी।

कई पहलुओं पर काम बाकी है:

रंगकर्मी सीमा मोदी कहती हैं कि महिलाओं पर बहुत सी कहानिया हैं, जिसका मंचन अभी तक नहीं हुआ। अब ऐसी कहानियों पर काम करके इसका मंचन करेंगे। वर्ष 2008 में अपना पहला नाटक सूत न कपास करने वाली सीमा मोदी ने पिछले लगभग दस वषों में कमला, तुम्हें छू लूं जरा, एक अकेली औरत, लाछन, बेबी, एंटिगनी, चंपा की चाह, बूढ़ी काकी समेत कई प्रसिद्ध नाटक किए। आत्मजीत के साथ उनकी नौटंकी बाजे ढिंढोरा को काफी सराहा गया। सीमा मोदी ने कई फिल्मों में भी काम किया, जिसमें शोरगुल, दोस्ती जिंदाबाद और झुमकी हैं।

क्या कहते हैं निदेशक ?

बीएनए निदेशक का कहना है कि महिलाएं अब रंगमंच पर अपना परचम लहरा रही हैं। भारतेंदु नाट्य अकादमी में कुछ साल पहले चार-छह लड़किया कोर्स के लिए चयनित होती थी, अब संस्थान में 40 विद्यार्थियों में 17 लड़किया है। – कलाकार एसोसिएशन अध्यक्ष संगम बहुगुणा के मुताबिक, पिछले कई वर्षो से शहर में महिला रंगकर्मियों की संख्या बढ़ी है, रंगमंच में महिला केंद्रित कहानी भी दिखाई जा रही है। महिला अब थिएटर में भी अपनी छाप छोड़ रही हैं। 1संगम बहुगुणा, अध्यक्ष, कलाकार एसोसिएशनपिछले कई वर्षो से शहर में महिला रंगकर्मियों की संख्या बढ़ी है, रंगमंच में महिला केंद्रित कहानी भी दिखाई जा रही है। महिला अब थिएटर में भी अपनी छाप छोड़ रही हैं।

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