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स्वदेशी विचार को जीवन में अपनाना होगा

कोविड-19 के प्रकोप से घिरे समूचे विश्व के साथ ही भारतवर्ष भी आज इस महामारी से घायल है, साथ ही आत्मनिर्भरता के मार्ग पर आगे बढ़ने को संकल्पबद्ध भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही देश से आत्मनिर्भर बनने का आह्वान किया तो इसकी परिभाषा पर चर्चा तेज हो गयी।

भारत में वैसे तो स्वदेशी का विचार पुराना है परंतु 1905 के ‘बंग भंग विरोधी’ जन जागरण से स्वदेशी सोच को बल मिला, 1911 तक चला यह आंदोलन महात्मा गांधी के भारत में आगमन से पहले के सफल अभियानों में से एक था। बाल गंगाधर तिलक के साथ ही अरविंद घोष, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, वीर सावरकर और लाला लाजपत राय इस स्वदेशी आन्दोलन के मुख्य प्रवर्तक थे।

आधुनिक भारत में लोकमान्य कहे जाने वाले बाल गंगाधर तिलक ने सदैव ही कहा है कि हमारा उद्देश्य आत्मनिर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं, उन्होंने स्वदेशी संसाधनों का प्रयोग व विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे विचारों को बल दिया तो आगे चलकर महात्मा गांधी ने तिलक के विचारों की इस नींव पर स्वदेशी आन्दोलन जैसे सत्याग्रह की विशाल इमारत खड़ी की और स्वदेशी को स्वराज की आत्मा कहा।

महात्मा ने ‘हिन्द स्वराज’ नामक पुस्तक में भारत के आर्थिक मॉडल को भी विस्तार से समझाया है, उन्होंने स्वदेशी के पक्ष में भारत के उस औपनिवेशिक शोषण को खारिज किया था जिसमें अंग्रेज अपना खजाना भरते थे और भारत के अधिकांश लोग मूलभूत सुविधाओं तक से वंचित रहते थे। गांधी कहते थे कि स्वदेशी केवल रोटी, कपड़ा और मकान का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जीवन का दृष्टिकोण है, स्वदेशी के अभाव में राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मानसिक स्वातंत्रय असंभव है।

विश्व के अनेक देशों ने महात्मा गांधी के स्वदेशी विचार को अपनाकर ही अपने राष्ट्र का कायाकल्प किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जापान जब पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गया तो स्वदेशी का मंत्र अपनाकर मृतप्राय: राष्ट्र में नवीन चेतना का संचार हुआ और अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर वह विश्व के विकसित देशों की कतार में आ खड़ा हुआ।

इसी प्रकार 20वीं सदी में सोवियत संघ में राजशाही के अंत के उपरांत स्टालिन के नेतृत्व में स्वदेशी नीति को प्राथमिकता देकर ही अपना बुनियादी ढाँचा मजबूत किया गया। अगर चीन पर गौर करें तो 1949 में भारत के अपेक्षाकृत लगभग हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था व भारी कर्ज से लदा हुआ भी परंतु स्वदेशी की नीति को बल देकर ही उसने विकास की नई ऊंचाइयों को छुआ और आज विश्व व्यापार में चीन की हिस्सेदारी किसी से छिपी नहीं है।

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