नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम को स्वास्थ्य कारणों के आधार पर अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने उन्हें एम्स की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर चौबीसों घंटे सहायता के लिए अपनी पसंद का प्रशिक्षित केयरटेकर रखने की अनुमति दे दी है।
न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने 31 जुलाई को एम्स द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट पर विचार किया। रिपोर्ट में कहा गया था कि आसाराम को अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उन्हें लगातार चिकित्सकीय सहायता की जरूरत है।सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वासन दिया कि एम्स की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू किया जाएगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि आसाराम अपनी पसंद के प्रशिक्षित केयरटेकर की 24 घंटे सेवाएं ले सकते हैं।
पीठ ने कहा, 31 जुलाई 2026 के एम्स के पत्र को हमने ध्यान में लिया है। सॉलिसिटर जनरल के इस बयान के आधार पर कि पत्र में दी गई सिफारिशों को पूरी भावना के साथ लागू किया जाएगा, याचिकाकर्ता को चौबीसों घंटे अपनी पसंद के प्रशिक्षित केयरटेकर की सहायता लेने की स्वतंत्रता होगी।सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ती है तो वह अपनी जमानत याचिका दोबारा पेश कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरोप लगाया कि आसाराम ने अदालत से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए हैं। उन्होंने कहा कि आसाराम ने यह जानकारी नहीं दी थी कि उन्होंने पैरोल के लिए भी आवेदन किया था। मेहता ने बताया कि राजस्थान हाईकोर्ट ने बुधवार को आसाराम को 20 दिन की पैरोल मंजूर की थी।एम्स की रिपोर्ट और सभी दलीलों पर विचार करने के बाद शीर्ष अदालत ने अंतरिम जमानत देने से इनकार करते हुए केवल चिकित्सकीय सहायता के लिए प्रशिक्षित केयरटेकर रखने की अनुमति दी।
आसाराम ने जोधपुर में वर्ष 2013 में एक नाबालिग शिष्या से दुष्कर्म के मामले में अपनी सजा को बरकरार रखने वाले राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने लंबित अपील के दौरान अंतरिम जमानत की मांग भी की थी। ट्रायल कोर्ट ने आसाराम और दो अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया था। इस साल मई में राजस्थान हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और अन्य संबंधित अपराधों में आसाराम की सजा को बरकरार रखा, हालांकि अदालत ने आपराधिक साजिश और सामूहिक दुष्कर्म के आरोपों को साबित नहीं मानते हुए उन आरोपों से बरी कर दिया था।





