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यस बैंक को सहारा

देश की वित्तीय प्रणाली में गहरे तक घुसा एनपीए वायरस एक-एक कर वित्तीय संस्थानों को ध्वस्त कर रहा है और अंतत: सरकार को आगे आकर बचाना पड़ता है।

पांच-छह वित्तीय वर्षों से केन्द्र सरकार एनपीए से खस्ता हाल हो चुके पीएसयू बैंकों में पूंजी डालने के लिए बजटीय प्रावधान कर रही है। पूंजी डालने के कारण ही सरकारी बैंक बचे हैं और जैसे-तैसे अपनी समस्याओं से उबर रहे हैं। सरकारी बैंकों के साथ प्राइवेट सेक्टर के भी कई वित्तीय संस्थान एनपीए और शीर्ष प्रबंधन के घोटाले के कारण संकट में हैं।

इन संस्थानों को बचाना जरूरी है क्योंकि वित्तीय तंत्र फेल होता है, तो नुकसान ज्यादा होगा। यह नुकसान डिपॉजिटर्स, इन्वेस्टर्स, के्रडिटर्स को को तो होगा ही साथ ही देश की प्रगति भी बाधित होगी। पिछले साल तीन बड़े वित्तीय संस्थान एनपीए, कैश क्रंच और घोटाले के कारण संकटग्रस्त हुए जिन्हें बचाने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। आईडीबाई बैंक का एनपीए 30 प्रतिशत तक पहुंच गया था और इस बैंक के अपने बूते उबरने की संभावना नहीं थी।

आईडीबीआई को खस्ता हाल करने में इसका प्रबंधन और उसके द्वारा बांटे गये अनाप-शनाप कर्ज की भूमिका प्रमुख थी। इसको एलआईसी का सहारा मिला और अब यह बैंक संकट से उबर रहा है। आईएलएण्ड एफएस का संकट भी इसके शीर्ष प्रबंधन व सांविधिक एकाउंटेंट की गड़बड़ियों और एनपीए के कारण पैदा हुआ। आईएलएण्डएफएस बुनियादी ढांचा क्षेत्र का सबसे बड़ा लेंडर्स है, विभिन्न बुनियादी परियोजनाओं में इसका सवा लाख करोड़ के करीब एक्सपोजर है जबकि 95 हजार करोड़ के करीब कर्ज है।

इस संस्थान में गड़बड़ियों की जांच हो रही है और सरकार ने बोर्ड को भंग कर नये निदेशकों की नियुक्ति की है जो संस्थान को वित्तीय संकट से उबारने और पूंजी जुटाकर इसके कामकाज को सामान्य बनाने में जुटा है। तीसरा बड़े वित्तीय संस्थान डीएचएफल ने भी डिफॉल्ट किया। डीएचएफएल नकदी की कमी और भुगतान में चूक के कारण संकटग्रस्त हुआ लेकिन आज भी यह संस्थान मुनाफे हैं। संकटग्रस्त संस्थानों को बचाने के लिए सरकार पहल करती है तो इसमें कोई नुकसान नहीं है।

इससे संस्थान भी बच जायेंगे, वित्तीय प्रणाली को झटका भी नहीं लगेगा और जो पूंजी निवेश की जायेगी उस पर वैल्यू एप्रीशिएशन भी मिलेगा। जैसे सत्यम में निवेश से टेक महिन्द्रा को फायदा हुआ। यस बैंक के पास 1000 ब्रॉच, 1800 एटीएम, 2.24 लाख करोड़ का एक्सपोजर और दो लाख करोड़ के करीब देनदारी है। यह निजी क्षेत्र का चौथा सबसे बड़ा बैंक है। कारपोरेट एवं रिटेल बैंकिंग में इसका ठीक-ठाक दखल है।

एक माह तक 50 हजार निकासी सीमा तय करने से निश्चय ही इसके जमाकर्ताओं को असुविधा होगी लेकिन सरकारी निवेश से यह संस्थान भी बच जायेगा और निवेश पर बढ़िया रिटर्न भी मिलेगा। यस बैंक में आरबीआई का दखल सही है और जमाकर्ताओं को भी पैनिक नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनकी पूंजी सुरक्षित है।

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