लखनऊ। इन दिनों सुनीता चर्चा में हैं अपनी नई फिल्म ‘गुड़हल’ से। कई फिल्म फेस्टिवल्स में सराही गई इस फिल्म वृद्धाश्रमों की उन अनकही सच्चाइयों से पर्दा उठाती है। सुनीता का कहना है कि इस फिल्म में काम करने के बाद उन्हें काफी संतुष्टि मिली। वे कहती हैं, ‘गर्व होता है, जब आप अवॉर्ड विनिंग फिल्मों का हिस्सा बनते हैं। इस बार तो मैं किसी फेस्टिवल में नहीं जा पाई, जाहिर है निमार्ता के लिए भी सभी कलाकारों को फेस्टिवल में ले जाना आर्थिक रूप से भारी पड़ता है, मगर कांस में संतोष की स्क्रीनिंग पर उस गर्व भरे पल को महसूस कर चुकी हूं।’ इस खास मुलाकात में वे अपनी जिंदगी और करियर के कई अनछुए पहलुओं पर बेबाकी से बात करती हैं।
घर में बेटा-बेटी के बीच भेद कभी नहीं हुआ
हल्द्वानी में पली-बढ़ी सुनीता राजवारका मानना है कि वे बहुत खुशकिस्मत हैं, जो उन्हें प्रोग्रेसिव परिवार मिला। वे कहती हैं, ‘मेरी मां हाउस वाइफ थीं और पिता ट्रक ड्राइवर, इसके बावजूद दोनों ही बहुत लिबरल थे। चाहे बात पढ़ाई की हो, जीवन जीने की हो या सोच की, उन्होंने कभी लड़का-लड़की में फर्क नहीं किया। हमने बहुत अच्छी जिंदगी जी। अच्छे स्कूलों में पढ़े, अच्छी जगह घूमे और सबसे बड़ी बात घर का माहौल बहुत अच्छा था। मुझे मेरे पिता ने कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया। मैंने सचमुच एक फ्री बर्ड की तरह जिंदगी जी। हम दो बहनें हैं और एक छोटा भाई है। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि भाई को ज्यादा महत्व मिले और हमें कम। मैंने बचपन से यही देखा कि जो काम लड़का कर सकता है, वही काम लड़की भी कर सकती है। यही वजह है कि मुझे आज भी कुछ भी असंभव नहीं लगता।’
नाटकों से जुगाड़ तो एनएसडी से जिंदगी सीखी
पंचायत की क्रांति देवी के रूप में लोकप्रिय हुई सुनीता ने बचपन में एक्टिंग के बारे में कभी सोचा नहीं था। वे हंसते हुए कहती हैं, ‘बचपन में तो रामलीला में रावण के दरबार में खूब नाची हूं। लेकिन जब मैं बड़ी हुई तो मैं नैनीताल के युगमंच नामक नाटक ग्रुप से जुड़ गई। बड़े कमाल के दिन थे। कई बार कलाकार अपनी मां की साड़ी, पत्नी के कपड़े, बच्चों के कपड़े लेकर आते थे। सेट भी खुद मिलकर बनाते थे। लेकिन हमारा ग्रुप काफी व्यवस्थित था। पैशन था नाटकों का, बेबसी नहीं थी।’ मगर जब वे एनएसडी में आईं तो उनका सामना एक अलग दुनिया से हुआ। बकौल सुनीता, ‘ एनएसडी में आपको सिर्फ अभिनय नहीं सिखाया जाता, बल्कि जिंदगी जीना सिखाया जाता है। तीन साल तक आप बीस अजनबियों के साथ रहते हैं। पहले ही दिन ऐसा लगता है जैसे आपको समंदर में छोड़ दिया गया हो। अब तैरना है या डूबना है, यह आपको खुद तय करना है। वहां कोई टीचर स्कूल की तरह पीछे नहीं पड़ता। सही फैसला लेना है या गलत, सब आपकी जिम्मेदारी होती है।’
खुद को कभी हीरोइन के रूप में नहीं देखा
सभी जानते हैं कि सुनीता रजवार को अपने अनकन्वेंशनल लुक्स के कारण कई छोटी-मोटी भूमिकाओं से गुजरना पड़ा, मगर उन्हें इस बात का कोई शिकवा नहीं है। वे कहती हैं, ‘मेरे दिमाग में कभी यह था ही नहीं कि मुझे हीरोइन बनना है या सिर्फ मेन लीड करना है। मैंने कभी अपने आपको उस नजर से देखा ही नहीं। शायद यही मेरे लिए प्लस पॉइंट रहा। मेरे हिसाब से काम, काम होता है। अगर कोई यह सोचकर आता है कि मुझे सिर्फ हीरोइन बनना है और फिर उसे वैसा काम नहीं मिलता, तो उसे झटका लगता है। लेकिन मैं मानसिक रूप से पहले से तैयार थी। मगर हां, जिस वक्त मैंने एक्टिंग में एंट्री ली, उस वक्त ग्लैमर बहुत बड़ी चीज थी। विज्ञापनों में भी वही लोग काम पाते थे, जिनके बड़े-बड़े फोटोग्राफर से पोर्टफोलियो बने होते थे। शुरूआत में थोड़ा अजीब लगता था कि अच्छा, ऐसे काम मिलता है। लेकिन मुझे लगातार काम मिलता रहा, चाहे छोटा हो या बड़ा। इसलिए मैंने उस बात को स्वीकार कर लिया कि यही फैक्ट है और इसी हिसाब से काम करना होगा।’
क्रांति देवी ने नहीं धनिया ने बदली जिंदगी
लोगों का मानना है कि पंचायत में क्रांति देवी की भूमिका सुनीता के करियर का अहम मोड़ साबित हुई, मगर सुनीता इस बात को खारिज करते हुए कहती हैं, ‘मेरी जिंदगी सिर्फ पंचायत से नहीं बदली। उससे पहले मैंने ये रिश्ता क्या कहलाता है में धनिया नाम का चरित्र किया था। हालांकि वह मेड का किरदार था, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण था। उसी रोल से मुझे घर-घर में पहचान मिली। मैंने टीवी और फिल्मों में काम किया। एक चालीस की लास्ट लोकल में मेरे काम की बहुत तारीफ हुई थी। उस फिल्म के लिए मुझे बेस्ट ब्रेकथ्रू परफॉर्मेंस का नॉमिनेशन भी मिला था। लेकिन टीवी की लोकप्रियता अलग होती है। शायद उसी वजह से लोगों ने मुझे नोटिस किया और फिर मुझे गुल्लक के लिए बुलाया। गुल्लक के बाद पंचायत आई। दिलचस्प बात ये है कि मैंने नीना गुप्ता की भूमिका के लिए आॅडिशन दिया था, मगर वो रोल मुझे नहीं मिला। लेकिन बाद में मेरे लिए क्रांति देवी का किरदार क्रिएट किया गया और मैं फेमस हो गई। देखिए, हमें कभी नहीं पता होता कि क्या खोकर क्या मिलने वाला है।’





