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रुक्मिणी विवाह के साथ सम्पन्न हुई श्रीमद् भागवत कथा

नवें दिन रुक्मिणी विवाह और सुदामा प्रसंग के बाद भव्य भंडारा भी हुआ
लखनऊ। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन 4 से 12 जुलाई तक गोमती नगर वास्तु खंड तीन के श्री सिद्धेश्वर महादेव मंदिर पार्क परिसर में किया गया। इस श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में कथा व्यास, नैमिष चक्र तीर्थ धाम वाले विनोदानंद शास्त्री जी महाराज रहे जबकि मुख्य यजमान स्वयं हनुमान जी महाराज और स्वागतकांक्षी शान्ति देवी जी थीं। शास्त्री जी बीते पन्द्रह वर्षों से कथा ज्ञान यज्ञ के माध्यम से संस्कार प्रदान कर रहे हैं। विशेष रूप से बच्चों के लिए बाल संस्कारशाला का आयोजन कर माता-पिता एवं समाज के प्रति उनके कर्तव्यों के लिए उन्हें जागरुक कर रहे हैं। साथ ही पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता का अभियान भी संचालित कर रहे हैं। विनोदानंद शास्त्री जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के नवें दिन रविवार 12 जुलाई को सुदामा और रुक्मिणी प्रसंग की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि रुक्मिणी विवाह का प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण का सबसे दिव्य, आनंदमयी और उमंग से भरा प्रसंग है। यह दृश्य केवल दो राजाओं के परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि साक्षात महालक्ष्मी और नारायण का अलौकिक मिलन है, जो पूरी प्रकृति और भक्तों के मन में परम आनंद का संचार कर देता है। इस क्रम में उन्होंने यह भी बताया कि सुदामा प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची मित्रता अमीरी-गरीबी या ओहदे की मोहताज नहीं होती। यह प्रसंग हमें निस्वार्थ प्रेम, अहंकार से दूर रहने और बिना कहे मित्र की परेशानी समझकर उसकी मदद करने का शाश्वत संदेश देता है वहीं रुक्मिणी-कृष्ण प्रसंग केवल एक प्रेम प्रसंग नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा का परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण, अटूट विश्वास और भक्ति का संदेश है। रुक्मिणी विवाह प्रसंग ने जहां उत्साह का संचार किया वहीं सुदामा प्रसंग ने भक्तों के नैनों को अश्रुओं से सराबोर कर दिया। इस अवसर पर आरती-पूजन में भी बड़ी संख्या में भक्तगण एकत्रित हुए। कथा व्यास गद्दी मंच की भव्य सज्जा सभी भक्तों को दिव्यता से सराबोर कर गई। भजनों के क्रम में आगंतुकों ने न जी भर के देखा ना कुछ बात की, बड़ी आरजू थी मुलाकात की का सरस रसपान किया। इस मनभावन भजन के उपरांत उन्होंने पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए सुनाया तो भक्तगण आनंद से झूम उठे। अंतिम दिन रविवार 12 जुलाई को कथा समापन के उपरांत भव्य भंडारा भी हुआ।

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