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संकष्टी चतुर्थी व्रत आज, होगी भगवान गणेश की पूजा

लखनऊ। हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत विघ्नहर्ता भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति भाव से गणपति बप्पा की पूजा-अर्चना करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति संकष्टी चतुर्थी के दिन पूरे नियम और विधि-विधान से व्रत रखता है, उसे मनचाहा फल अवश्य मिलता है। साथ ही उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन भी आते हैं। पंचांग के आधार पर देखा जाए तो वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी यानि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी ति​थि 9 अक्टूबर दिन गुरुवार को रात में 10 बजकर 54 मिनट से शुरू होगी. इस तिथि का समापन 10 अक्टूबर दिन शुक्रवार को शाम 7 बजकर 38 मिनट पर होगा. उदया​तिथि को देखते हुए वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 10 अक्टूबर शुक्रवार को है।

सिद्धि योग में वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी
इस बार वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी पर सिद्धि योग बन रहा है। उस दिन सिद्धि योग व्रत के दिन प्रात:काल से लेकर शाम को 5 बजकर 41 मिनट तक है। उसके बाद से व्यतीपात योग बनेगा. व्रत पर कृत्तिका नक्षत्र प्रात:काल से लेकर शाम 05 बजकर 31 मिनट तक है, उसके बाद रोहिणी नक्षत्र है।

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय
दिनभर व्रत रखने के बाद शाम के समय में चंद्रमा की पूजा करके अर्घ्य देते हैं. वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रोदय रात 08:13 पी एम पर है। इस समय चंद्र देव को कच्चे दूध में पानी, अक्षत्, फूल डालकर अर्पित करते हैं। उसके बाद पारण किया जाता है।

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का राहुकाल
इस ​व्रत के दिन राहुकाल सुबह में 10 बजकर 41 मिनट से दोपहर 12 बजकर 08 मिनट तक है। राहुकाल के समय में आपको कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।

संकष्टी चतुर्थी का महत्व
संकष्टी चतुर्थी यानि संकटों को नष्ट करने वाली चतुर्थी. संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत रखने और गणेश पूजा करने से कष्ट मिटते हैं और संकट दूर होते हैं. गणेश जी की कृपा से कार्य सफल होंगे और मनोकामनाएं पूरी होंगी।

पूजा विधि
संकष्टी चतुर्थी के दिन एक साफ चौकी पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें। अब गणेश जी को वस्त्र अर्पित करें और उन्हें तिलक लगाएं। इसके बाद प्रभु को दूर्वा चढ़ाएं, इससे वह प्रसन्न होते हैं अब घी का दीपक जलाएं और प्रभु को फूल माला पहनाएं। अब मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। गणेश चालीसा का पाठ करें। अंत में गणेश जी की आरती करें और पूजा में हुई भूल की क्षमा मांगे।

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