लखनऊ। भारतीयम् एवं शिवांजना एंटरटेनमेंट्स के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार 11 जुलाई को गोमतीनगर स्थित अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में दो अत्यंत मार्मिक नाट्य कथाओं ठेस एवं अपरिचित का मंचन किया गया। राजीव रंजन सिंह द्वारा निर्मित एवं आशुतोष शुक्ल द्वारा लिखी इन दोनों कहानियों का निर्देशन वरिष्ठ निर्देशक गोपाल सिन्हा द्वारा किया गया। इस विशेष सांस्कृतिक संध्या के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य पवन सिंह चौहान थे। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु सिंह और वरिष्ठ रंगकर्मी पद्मश्री डॉ. अनिल रस्तोगी का सम्मान भारतीयम के संस्थापक पुनीत अस्थाना द्वारा किया गया।
प्रथम प्रस्तुति ठेस त्याग, प्रेम, विश्वास और आत्मसम्मान की ऐसी मार्मिक कथा है, जो भारतीय पारिवारिक जीवन की गहरी संवेदनाओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती है। यह केवल एक स्त्री की कथा नहीं, बल्कि उस मौन पीड़ा का चित्रण है जिसे अनेक बार शब्द भी व्यक्त नहीं कर पाते। परिस्थितियों के बीच अपने प्रियजनों के सुख को सर्वोपरि रखने वाली नारी के अंतर्मन में उठते भावों को लेखक ने इतनी सहजता और संवेदनशीलता से उकेरा है कि दर्शक अनायास ही उसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। यह कथा इस सत्य को रेखांकित करती है कि समय अनेक घाव भर देता है, किंतु मन पर लगी कुछ ठेस जीवनभर स्मृति बनकर साथ रहती हैं।
दूसरी प्रस्तुति अपरिचित, लेखक आशुतोष शुक्ल की विचारोत्तेजक रचना है, जिसका प्रभावशाली पुनर्लेखन राधेश्याम सोनी ने किया है। आधुनिक विज्ञान, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के बीच उत्पन्न होने वाले जटिल प्रश्नों को यह नाटक अत्यंत संतुलित और संवेदनशील दृष्टि से प्रस्तुत करता है। एक अप्रत्याशित आगंतुक का आगमन एक सामान्य परिवार के जीवन में ऐसे प्रश्न खड़े कर देता है, जिनका उत्तर केवल तर्क से नहीं, बल्कि हृदय से खोजा जाना पड़ता है। यह नाटक दर्शकों को सोचने पर विवश करता है कि संबंधों की वास्तविक नींव, रक्त से बनती है या प्रेम, विश्वास और संस्कार से।
प्रस्तुति में रूपाली चंद्रा, राजीव रंजन सिंह तथा राजीव त्रिपाठी अपने सशक्त और स्वाभाविक अभिनय से पात्रों को जीवंत बना देते हैं। उनके संवादों की गहराई, भाव-भंगिमाओं की सहजता तथा मंच पर उनकी प्रभावशाली उपस्थिति दर्शकों को कथा का अभिन्न हिस्सा बना देती है। प्रत्येक कलाकार ने अपने चरित्र को केवल निभाया नहीं, बल्कि उसे पूरी आत्मीयता और संवेदना के साथ जिया है। यही कारण है कि प्रस्तुति समाप्त होने के बाद भी उसके पात्र और उनके भाव लंबे समय तक दर्शकों के मन में बने रहते हैं।





