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अब संसद में विरोध

सड़क पर बीते दो महीने से जारी किसान संगठनों का आंदोलन गणतंत्र दिवस पर भारी हिंसा, उग्र प्रदर्शन और राष्ट्रीय प्रतीक लाल किले में हुई शर्मनाक हिंसा के साथ खत्म होने के कगार पर है, लेकिन अब तीनों कृषि सुधार बिलों पर यही दृश्य संसद के अंदर भी देखने को मिल सकता है। क्योंकि अब विपक्ष इस मुद्दे को लंबा खींचना चाहता है।

गौरतलब है कि मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में अध्यादेश के जरिए भूमि सुधार कानून लाया गया था जिसे तीन बार अध्यादेश के जरिए आगे बढ़ाया गया, लेकिन राज्यसभा में विपक्ष का बहुमत था और उसने किसी भी सूरत में भूमि अधिग्रहण कानून को पास नहीं होने दिया। माना जाता है कि अगर नया भूमि अधिग्रहण कानून आज होता तो देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को काफी मदद मिलती, लेकिन भूमि अधिग्रहण इतना कठिन है कि कोई उद्यमी फैक्ट्री लगाने से पहले जमीन की उपलब्धता को लेकर सौ बार सोचता है।

क्योंकि देश में कंपनी लगाने के लिए जमीन मिलना इतना कठिन हो गया है कि एक तो जमीन न मिलने के कारण वर्षों विलम्ब होता है और दूसरे जमीन अधिग्रहण की लागत इतनी अधिक है कि किसी प्रोजेक्ट में निवेश की आधे से अधिक लागत केवल जमीन के मद में निकल जाती है। यही कारण है कि जब चीन से विनिर्माण उद्योग शिफ्ट हो रहा है तो उसका लाभ भारत को मिलने के बजाय वियतनाम, ताईवान और बांग्लादेश को मिल रहा है, क्योंकि यहां आसानी से जमीन मिलने के साथ ही उद्योग की स्थापना सरल है।

अगर मोदी का भूमि अधिग्रहण कानून संसद से पास हो जाता तो आज विनिर्माण उद्योग तेजी से प्रगति कर रहा होता और मेक इन इंडिया काफी हद तक सफल हो सकता था, लेकिन विपक्ष ने राज्यसभा में बहुमत का उपयोग कर भूमि अधिग्रहण कानून को पास नहीं होने दिया। अब दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर किसानों के मुद्दे पर देश में बड़ा आंदोलन चल रहा है। किसान संगठन करीब तीन-चार महीने से हिंसक, अहिंसक सभी तौर तरीकों से आंदोलन कर तीनों कृषि सुधार कानूनों की वापसी की मांग कर रहे हैं।

अपनी मांगों को लेकर धरना, प्रदर्शन, ट्रैक्टर मार्च, हिंसा, सरकार से 11 दौर की वार्ता, पंजाब में रिलायंस के 1500 टॉवर तोड़ने के अलावा राष्ट्रीय विरासत लालकिले में घुसकर भारी नुकसान पहुंचा चुके हैं। जाहिर है इतनी हिंसा के बाद अब किसान संगठनों के साथ देश की सहानुभूमि नहीं बची है, ऐसे में यह आंदोलन अब ढलान पर है। लेकिन जब किसान संगठनों का उग्र आंदोलन कमजोर पड़ रहा है तो राजनीतिक दल इसकी कमान संभालने के लिए तैयार हो गये हैं और उनके सामने एक बड़ा मौका संसद का बजट सत्र है।

इसी के मद्देनजर 18 राजनीतिक दलों ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार करने की घोषण कर दी है। बहिष्कार करने वाले दलों में लगभग संपूर्ण विपक्ष शामिल है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने संसद में बिना चर्चा कराये ही तीन कृषि सुधार कानूनों को पास करा लिया था। इसलिए राष्ट्रपति के अभिभाषण का वे विरोध करेंगे।

बजट सत्र की शुरूआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होती है और अगर पहले ही दिन विपक्ष के ये तेवर हैं तो पूरे बजट सत्र में कृषि कानूनों को लेकर बड़ा हंगामा होना तय है। बहरहाल यहां जरूरत इस बात की है कि सरकार और विपक्ष मिलकर कृषि कानूनों की कमियों को दूर करें और एक बेहतरीन कानून पास करें ताकि कृषि के प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सके।

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