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विचारों की प्रबलता

विचारों हमेशा हमारा मार्गदर्शन करते हैं और विचारों की शक्ति इतनी प्रबल होती है कि मनुष्य को हमेशा रास्ता दिखाती है। विचारों से विचार और कर्मों से काटे जाते हैं। पाप कर्मों से निवृत्ति के लिए एक ही उपाय है कि उनके प्रतिपक्षी पुण्य कर्म उतने ही प्रबल स्तर के आरम्भ कर दिये जाएं। प्रायश्चित्यों की, पुण्य प्रयोजनों की प्रक्रिया अपनाने का महत्व शस्त्रकारों ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए बताया है।

लोक मंगल की सत्प्रवृत्ति सम्बर्द्धन की गतिविधियां न अपनाई जायें तो संचित पाप कर्म कट नहीं सकेंगे। आग को बुझाने लिए पानी की जरूरत पड़ती है। पाप कर्मों की विभीषिका जलती हुई आग के समान है। सत्कर्मों में प्रवृत होकर ही उन्हें शान्त किया जा सकता है। पूजा-पत्री की तथा सरल कर्मकाण्डों की लकीर पीट देने से पापों कीनिवृत्ति होने की बात सोचना व्यर्थ है। जितना भारी पाप उतना ही वजनदार पुण्य होना चाहिए तभी संतुलन बनेगा।

सड़क पर गड्ढ़ा खोदकर दूसरों को गिराने का जो उपक्रम किया गया है, उस दुष्कर्म की निवृत्ति के लिए आवश्यक है कि जितना श्रम गड्ढा खोदने में किया गया है उतना ही मिट्टी ढोकरउसे पाटने में किया जाये। क्षतिपूर्ति के लिए हर्जाने देने पड़ते हैं। मुख से क्षमा मांग लेने या पत्र-पष्प, दण्ड प्रणाम जैसी चिन्ह पूजा कर देने से किसी के साथ क्षतिपूर्ति का समझौता नहीं होता। ऐसे प्रसंगों में अदालतें क्षति के समलुल्य उचित हर्जाना दिलाती हैं।

विचारों की काट विचारों से होती है। पतनोन्मुख प्रवृत्ति नीचे गिरने में पृथ्वी की आकर्षण शक्ति जैसा कार्य करती है। पानी गिरने पर नीचे की दिशा में सहज ही बहने लगता है। पर यदि उसे ऊंचा उठाना है तो पाइप, रस्सी या अन्य प्रकार के साधन जुटाने की तथा ताकत लगाने की आवश्यकता पड़ती है। अनैतिक, कुविचार समीपवर्ती वातावरण में से उड़-उड़कर सहज ही मस्तिष्क पर छाते हैं और अपने आकर्षक प्रभाव से चिंतन चेतना को जकड़ लेते हैं। इन्हें काटने के लिए विपरीत स्तर के सद्विचारों को पढ़ने, सोचने, मनन करने एवं अपनाने के लिए प्रबल प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है।

यह कार्यविचार संघर्ष का महाभारत खड़ा किये बिना और किसी तरह संभव नहीं हो सकता। पाण्डवों को तथा अन्य धर्म समर्थकों को प्राण हथेली पर रखकर लड़ना पड़ा था। लंका काण्ड में भी रीछ, वानरों ने राक्षसों के साथ कट कटकर युद्ध किया था। इसका महाभारत और रामायण में विस्तारपूर्वक वर्णन हुआ है। वस्तुत: जीवन साधना के प्रत्येक साधक को ऐसा ही अन्त: युद्ध करना पड़ता है।

गीता रामायण पढ़ने-सुनने का लाभ तभी है जब इन महायुद्धों में लड़ने वाले वीर धर्म प्रेमियों की तरह हमारा भी उत्साह उमंगें और वैसा ही पराक्रम करने के लिए शौर्य, साहस क्रियाशील हो चले। शरीर पर छाया हुआ आलस्य और मन पर छाया हुआ प्रसाद चन्द्र सूर्य पर छाये हुए राहुल केतु द्वारा लगे हुए ग्रहण की तरह हैं।

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