लखनऊ। शनिवार को शहर के सभी गुरुद्वारों में गुरु अंगद देव जी महाराज के प्रकाश पर्व श्रद्धा पूर्वक मनाया गया। इसी क्रम में गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा मानसरोवर गुरु तेग बहादर नगर एलडीए कॉलोनी कानपुर रोड, नाका हिंडोला व सदर गुरुद्वारा में बहुत ही श्रद्धा से मनाया गया। गुरु अंगद देव जी महाराज के प्रकाश पर्व पर अध्यक्ष सरदार सम्पूरन सिंह बग्गा ने बताया कि दीवान की आरंभता अमृत वेले से नितनेम के पाठ, सुखमनी साहिब जी के पाठ के साथ हुई एवं हजूरी रागी भाई हरविंदर सिंह जी ने आशा दीवार के कीर्तन किये।और हैड ग्रंथि ज्ञानी परमजीत सिंह जी ने संगतो को गुरु अंगद देव जी महाराज के इतिहास के बारे में बताया। कि धन धन साहिब श्री गुरु नानक देव साहिब जी महाराज जी की दूसरी ज्योति के रूप में ब्रह्मांड को प्रकाशित करने वाले, सिखो को गुरुमुखी लिपि प्रदान करने वाले, गुरु शिष्य परम्परा में स्वयं को समर्पित कर, उस परंपरा को पुनर्जीवित करने वाले, गुरु नानक देव जी महाराज जी का इतिहास संकलन करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले, सेवा,विनम्रता एवम त्याग की प्रतिमूर्ति,दूसरे गुरु महाराज जी, साहिब श्री गुरु अंगद देव साहिब जी महाराज है। और हजूरी रागी भाई हरविंदर सिंह जी ने शब्द कीर्तन किया। वही सम्पूरन सिंह बग्गा जी ने यह भी बताया की हजूरी रागी भाई हरविंदर सिंह जी शब्द कीर्तन करते हुए शाम के दीवान की समाप्ति रात्री 9 बजे करेंगे।
अध्यक्ष सरदार सम्पूरन सिंह बग्गा एवं महासचिव चरणजीत सिंह एवं सचिव गगनदीप सिंह बग्गा एवं कोषाध्यक्ष अमरजीत सिंह (पम्मी),परमजीत चन्दर,वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरिंदर बग्गा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष इकबाल सिंह ने संगतो को गुरु अंगद देव जी महाराज के प्रकाश पर्व पर गुरु महाराज को नमन किया। शाम के दीवान की समाप्ति उपरांत गुरु का लंगर अटूट वितरित किया जायेगा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुरु अंगद देव जी महाराज के प्रकाश पर्व को बहुत ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया।
यहियागंज में शबद कीर्तन सुन संगत हुई निहाल
लखनऊ। ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी यहियागंज में श्री गुरु अंगद देव जी का प्रकाश पर्व आज सायं 7:30 बजे से 11 बजे तक बड़ी श्रद्धा सत्कार के साथ मनाया गया। गुरुद्वारा सचिव मनमोहन सिंह हैप्पी ने बताया कि डॉ गुरमीत सिंह के संयोजन में भाई करनैल सिंह जी भाई मोहन सिंह जी ने शबद कीर्तन द्वारा संगतो को निहाल किया। इस अवसर पर गुरुद्वारा साहब को विशेष फूलों एवं लाइटों से सजाया गया था हेड ग्रंथी ज्ञानी परमजीत सिंह जी ने श्री गुरु अंगद देव जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि श्री गुरु अंगद देव जी का जन्म 31 मार्च, 1504 को हरीके (मत्ते दी सराय, मुक्तसर) में हुआ था। उनके पिता श्री फेरू मल जी और माता का नाम रामो जी था
उनका मूल नाम ‘भाई लैणा’ जी था। गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं से प्रभावित होकर, वे करतारपुर साहिब में गुरु नानक जी की सेवा में लग गए। उनकी अटूट सेवा से प्रसन्न होकर गुरु नानक जी ने उन्हें अपना अंग (अंगद) कहा और अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। वे 1539 में सिख धर्म के दूसरे गुरु बने। उन्होंने पंजाबी भाषा की लिपि ‘गुरुमुखी’ को व्यवस्थित और लोकप्रिय बनाया।
माता खीवी जी के सहयोग से लंगर की व्यवस्था को सुव्यवस्थित और व्यापक बनाया। खड्डूर साहिब में ‘मल्ल अखाड़ा’ स्थापित किया, जहाँ शारीरिक कसरत के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जाती थी। संगत और पंगत की प्रथा को मजबूत कर जाति प्रथा का विरोध किया। उन्होंने 29 मार्च, 1552 को खड्डूर साहिब में अपना शरीर त्याग दिया और ज्योति जोत समा गए। गुरु अंगद देव जी का जीवन विनम्रता, सेवा और गुरु की आज्ञा के पालन का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।





