कठिनाई हर मनुष्य के जीवन में आती है। उनका आना अनिवार्य और आवश्यक है। प्रारब्ध कर्मों के भोग के बोझ को उतारने के लिए नहीं, वरन मनुष्य की मनोभूमि और अंतरात्मा को सुदृढ़, तीक्ष्ण, पवित्र, प्रगतिशील, अनुभवी और विकसित करने के लिए भी कष्टों एवं आपत्तियों की भारी आवश्यकता है। जैसे भगवान मनुष्य को दया करके नाना प्रकार के उपहार दिया करे हैं, जिससे मनुष्य का अज्ञान, अहंकार, आलस्य, अपवित्रता और व्यामोह नष्ट हो।
कठिनाइयां आने पर हतप्रभ, किंकर्तव्य विमूढ़ या कायर और हाथ पैर फुलाकर रोना-झीकना शुरू कर देना, अपने को या दूसरों को कोसना सर्वथा अनुचित है। यह तो भगवान की उस महान कृपा का तिरस्कार करना हुआ। इस प्रकार तो वे कठिनाई कुछ लाभ न दे सकेंगी वरन उल्टे निराशा, कायरता, अवसाद, दीनता, आदि का काराण बन जायेगी। कठिनाई देखकर डर जाना, प्रयत्न छोड़ बैठना, चिंता और शोक करना किसी सच्चे मनुष्य को शोभा नहीं देता। आपत्ति एक प्रकार से हमारे पुरुषार्थ की ईश्वरीय चुनौती है जिसे स्वीकार करके ही हम प्रभु के प्रिय बन सकते हैं।
अखाड़े के उस्ताद पहलवान नौसिखिए पहलवानों को कुश्ती लड़ना सिखाते हैं। नौसिखिये लोग पटक खाकर शोक संतप्त नहीं हो जाते। वरन अपनी भूल को समझकर फिर उस्ताद से लड़ते हैं और धीरे-धीरे पूरे एवं पक्के पहलवान बन जाते हैं। ईश्वर ऐसा ही उस्ताद है जो आपत्तियों की पटक मार-मारकर हमारी अनेक अपूर्णताएं दूर करके पूर्णता तक पहुंचाने की महान कृपा करता है।
कठिनाइयों से डरने या घबराने की कोई बात नहीं। वह तो इस सृष्टि का एक उपयोगी, आवश्यक एवं सार्वभौम विधान है। उससे न तो दुखी होने की जरूरत है, न घबराने की, न किसी पर दोषारोपण करने की। हां हर आपत्ति के बाद नये साहस और नये उत्साह के बाद उस परिस्थिति से लड़ने की और प्रतिकूलता हटाकर अनुकूलता उत्पन्न करने के लिए प्रयत्नशीलता की आवश्यकता है। यह प्रयत्न आत्मा का धर्म है, इस धर्म को छोड़ने का अर्थ अपने को अधर्मी बनाना है।
प्रयत्न की महिमा अपार है। आपत्ति द्वार जो दुख सहना पड़ता है उसकी अपेक्षा उसे विशेष समय में विशेष रूप से प्रयत्न करने का जो स्वर्णिम अवसर मिला, उसका महत्व अधिक है। प्रयत्नशीलता ही आत्मोन्नति का प्रधान साधन है, जिसे अपत्तियां तीव्र गत से बढ़ाती हैं। प्रयत्न, परिश्रम एवं कर्तव्य पालन से मनुष्य के गौरव एवं वैभव का विकास होता है।





