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‘बूढ़ी काकी’ के व्यवहार ने बहू रूपा की जगा दी संवेदना

अभिषेक पंडित के निर्देशन में बूढ़ी काकी नाटक का मंचन

लखनऊ। भारतेंदु नाट्य अकादमी के स्वर्ण जयंती नाट्य समारोह में नाटक ‘बूढ़ी काकी’ का भावपूर्ण मंचन किया गया। प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी बूढ़ी काकी को कथावाचन शैली में आंचलिक लोकधुनों व कबीर वाणी के साथ प्रस्तुत किया गया। नाटक में बूढ़ी काकी जिनके पति व बच्चों का देहांत कालांतर में ही हो चुका है। अब वह अपने भतीजे बुधिनाथ के आश्रय पर रहती हैं। बुद्धिनाथ की पत्नी रूपा काकी को खाने को नहीं देती है। घर में कोई उनकी खोज-खबर नहीं लेता है, सिवाय लाडली के जो रूपा और बुधिनाथ की बेटी है। बुधिनाथ के बेटे का तिलक घर में पड़ता है। बहुत बड़ा उत्सव होता है। गांव भर के लोग खाते हैं पर उस दिन भी काकी को कोई भोजन नहीं देता। काकी कलपती रहती हैं। लाडली आधी रात को उनके लिए चोरी से कुछ खाने को ले जाती है पर काकी की भूख शांत नहीं होती। काकी लाडली के साथ बाहर पड़े जूठे पत्तलों के पास जाती है और जूठन चुन-चुन कर खाती हैं। तभी रूपा वहां आकर उस दृश्य को देखती है उसे बहुत ही ग्लानि होती है। वह काकी से माफी मांगती है और उन्हें खाने को देती है। इस प्रकार नाटक का सुखांत होता है। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त नाट्य निर्देशक अभिषेक पंडित के सधे निर्देशन व समकालीन नवीन प्रयोग से यह नाटक आज के परिवेश से बहुत ही सलीके से जुड़ता है। प्रेमचंद की कहानी में मोबाइल फोन का प्रयोग बहुत ही चालाकी से किया गया। लोक व मॉडर्न दोनों शैलियों का फ्यूजन निर्देशकीय कल्पना का परिणाम रहा, जो मूल कथ्य को और भी रोचक तरीके से प्रस्तुत करने में सफल हुआ।

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