साहित्यकार सम्मेलन और सम्मान समारोह का आयोजन
लखनऊ। हिंदी संस्थान में लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार श्रीकांत वर्मा की पुण्यतिथि पर आयोजित इस समारोह में साहित्यकारों और प्रबुद्ध नागरिकों का जमावड़ा हुआ। समारोह में कई साहित्यिक प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित होने वालों में पद्मश्री विद्या बिंदु सिंह, डॉ. रामकठिन सिंह, डॉ. डी. एस. शुक्ला, डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित, डॉ. अमिता दुबे, श्री नवीन शुक्ल, डॉ. शोभा दीक्षित ‘भावना’, सूर्य कुमार पांडेय, लोकेश त्रिपाठी, श्रीमती मनोरमा लाल, डॉ. मिथिलेश दीक्षित, डॉ. रश्मि शील, साहित्य भूषण कमलेश मौर्य (मृदुल), सुरेन्द्र अग्निहोत्री, संजीव जायसवाल संजय, अशोक जैन, नीरज अरोड़ा कविता तिवारी (कवयित्री) पिता, डॉ. ज्योत्सना सिंह, वेदव्रत बाजपेयी, श्री मनुव्रत बाजपेयी, विजय त्रिपाठी, डॉ. मंजू शुक्ला रहीं। मुख्य अतिथि दानिश आजाद अंसारी ने कहा कि श्रीकांत वर्मा हिंदी की ‘नई कविता’ धारा के प्रमुख कवि, कथाकार और पत्रकार थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में ऐतिहासिक मिथकों और आधुनिक यथार्थ का अद्भुत उपयोग कर सत्ता, मानवीय महत्वाकांक्षा और समकालीन राजनीति के अंतर्द्वंद्वों को बेहद प्रभावी ढंग से उजागर किया। विशिष्ट अतिथि राज्य सूचना आयुक्त दिलीप अग्निहोत्री ने कहा कि उनकी कविताएं तत्कालीन राजनीति और सत्ता की क्रूर महत्वाकांक्षा पर गहरी चोट करती थीं। वे सिर्फ कल्पना में विचरण करने वाले कवि नहीं थे, बल्कि उन्होंने समाज के अभाव, भुखमरी और मानवीय संघर्ष को अपनी कविताओं में सटीक वाणी दी। उनकी भाषा सहज, पैनी और अर्थपूर्ण थी। कम शब्दों में गहरा अर्थ (गागर में सागर) भरना उनकी प्रमुख शैली थी। विशिष्ट अतिथि संघ के धर्म जागरण प्रमुख अभय ने कहा कि श्रीकांत वर्मा परिवार में सबसे बड़े होने के कारण शिक्षा-दीक्षा के बीच घरेलू जिम्मेदारियों से इस कदर लदे-फदे, कि संघर्ष ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। साहित्य से सियासत तक शीर्ष पर रहने के बावजूद अपनी बीमारी के आखिरी दिनों में अमेरिका में भी उन्होंने अपनी डायरी में लिखा- ‘नहीं जानता यह डायरी जारी रहेगी या यह इसका अंतिम पन्ना होगा मगर इतना अवश्य कहूंगा, मैं जीना चाहता हूं। एकाग्रता इण्टरनेशनल फाउंडेशन के निदेशक डा० शक्ति कुमार पाण्डेय ने कहा कि जब उन्होंने कांग्रेस की राजनीति की ओर कदम बढ़ाए तो टाइम्स समूह के लिए वह स्वीकार्य नहीं रहा और उन्हें ‘दिनमान’ से अलग होना पड़ा। सन् 1969 में वह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के काफी करीब हो जाने से कांग्रेस के महासचिव बन गए। संस्था के राष्ट्रीय समन्वयक हिमांशु पाण्डेय ने कहा कि श्रीकांत वर्मा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में 18 सितम्बर 1931 को जन्मे और हिंदी के प्रतिष्ठित गीतकार, कथाकार, समीक्षक रहे। विशिष्ट अतिथि स्वाभिमान मंच की राष्ट्रीय अध्यक्ष गार्गी तिवारी ने कहा कि श्रीकान्त वर्मा उन गिने-चुने लोगों में रहे हैं, जिनकी पहुंच साहित्य के रास्ते सियासत तक बनी। वह एक वक्त में राज्यसभा सदस्य भी रहे। अपनी कृतियों ‘मायादर्पण’, ‘जलसाघर’ और ‘मगध’ से प्रतिष्ठित एवं ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित वर्मा के ‘झाड़ी’ तथा ‘संवाद’ कहानी-संग्रह, ‘अपोलो का रथ’ यात्रा वृत्तान्त, ‘बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में’ साक्षात्कार ग्रंथ भी उल्लेखनीय हैं। विशिष्ट अतिथि समाजसेवी मुरलीधर आहूजा ने कहा कि श्रीकांत वर्मा का परिवार समृद्ध था, फिर भी श्रीकांत वर्मा को काफी कठिन दिन देखने पड़े। 1952 तक वह बेकारी की मार झेलते रहे। घर की आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही थी। इसके बाद उन्होंने स्कूल शिक्षक की नौकरी शुरू कर दी। चूंकि वह परिवार में सबसे बड़े थे, इसलिए भी घर की जिम्मेदारी सबसे पहले उन्हीं के मत्थे आ पड़ी। अति विशिष्ट अतिथि खादी मंत्री राकेश कुमार सचान ने कहा कि 1954 में उनकी भेंट युग प्रवर्तक कवि-साहित्यकार गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ से हुई। उनकी प्रेरणा से बिलासपुर में वह ‘नयी दिशा’ पत्रिका का संपादन करने लगे। दो साल बाद वह ख्यात कवि नरेश मेहता से जुड़ गए और उनके साथ दिल्ली में ‘कृति’ पत्रिका का संपादन करने लगे।





