अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में तीन दिवसीय नाट्य समारोह का आगाज
लखनऊ। परिवार के टूटते हुए सबंधों, युवा महत्वकांक्षाओं को रेखाकिंत करता काँच के खिलौने का मंचन आकांक्षा थियेटर आर्ट्स, लखनऊ द्वारा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में किया गया। तीन दिवसीय नाट्य समारोह की प्रथम संध्या में सुप्रसिद्ध नाटककार टेनेसी विलियम्स की मूल नाट्य रचना तथा सौरभ श्रीवास्तव द्वारा रूपान्तरित काँच के खिलौने के कथानक 20 वीं 21 वीं सदी के संक्रमण काल में एक परिवार में टूटते हुए सम्बन्धों, युवा महत्वाकांक्षाओं और पीढ़ियों के टकराव तथा इन सब के दरम्यान भी माँ-बेटे, माँ-बेटी और भाई-बहन के बीच के भावनात्मक सम्बन्ध और मनोवैज्ञानिक जुड़ाव को रेखांकित करती है। कथानक के अनुसार एक छोटे से शहर के मध्यमवर्गीय परिवार की है। परिवार में तीन सदस्य है- आनंदा सिन्हा (माँ), उनका बेटा रोहन सिन्हा, और बेटी मीनाक्षी सिन्हा। पिता सालों पहले परिवार को छोड़कर जा चुके है जिनकी एक घुघली तस्वीर दीवार पर टंगी है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और पूरा परिवार रोहन की मामूली नौकरी पर निर्भर है। माँ के दबाव डालने पर रोहन अपने दफ्तर के एक साथी शुभम् को रात के खाने पर घर बुलाता है। माँ को उम्मीद है कि शुभम् और मीनाक्षी के बीच बात बन जाएगी और उनकी बेटी का घर बस जाएगा। इस मुलाकात के लिए माँ घर को सजाती हैं और मीनाक्षी को भी तैयार किया जाता है, हालांकि मीनाक्षी बहुत घबराई हुई होती है। शुभम् एक सकारात्मक और व्यवहारिक व्यक्ति है। वह मीनाक्षी से बात करता है, उसका आत्मविश्वास बढ़ाता है और उसके साथ डांस भी करता है। डांस के दौरान गलती से मीनाक्षी का सबसे पसंदीदा काँच का खिलौना गिरकर टूट जाता है। खिलौना टूटना इस बात का प्रतीक है कि मीनाक्षी की काल्पनिक दुनिया टूट रही है और वह वास्तविकता के करीब आ रही है। जब माहौल खुशनुमा होता है, तभी शुभम् खुलासा करता है कि उसकी सगाई हो चुकी है और यह जल्द ही शादी करने वाला है। यह सुनकर माँ के सपने चकनाचूर हो जाते है। शुभम् चला जाता है और माँ इसका दोष रोहन पर मढ़ देती हैं। अंत में रोहन अपनी माँ और बहन को छोड़कर हमेशा के लिए घर से चला जाता है, लेकिन वह चाहकर भी अपनी बहन मीनाक्षी की यादों और उसके काँच के खिलौनों के साये से मुक्त नहीं हो पाता। यहीं पर नाटक का समापन होता है। यह नाटक संदेश देता है। कि मध्यमवर्गीय परिवार की मजबूरियां और जिम्मेदारियाँ अक्सर इंसान के निजी सपनों की बली ले लेती है काँच के खिलौने उन नाजुक रिश्तों और उम्मीदों का प्रतीक है, जो हकीकत की एक छोटी सी चोट से भी टूट जाते हैं 60 दिवसीय कार्यशाला का संचालन नगर के सुप्रसिद्ध रंग निर्देशक तुषार बाजपेई शुभम ने किया। प्रधान भूमिका में आनंदा सिन्हा (माँ) की भूमिका में दिव्याजीत गुप्ता बेटा रोहन की भूमिका में अंकुर सक्सेना मीनाक्षी बेटी की भूमिका में मुस्कान सोनी तथा रोहन के कार्यालय में कार्य करने वाला युवक शुभम कुमार वर्मा की भूमिका में अभिषेक कुमार सिंह ने अपने सशक्त अभिनय से रंग दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया।





