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नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी

ऐसे वक्त में जब पूरा देश कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा है नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ राज्य के नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले में बारुदी सुरंग में विस्फोट कर पांच जवानों की जान ले ली है। याद होगा अभी गत वर्ष ही नक्सलियों ने सुकमा जिले के चिंतागुफा थाना क्षेत्र में 17 जवानों को मौत के घाट उतारा था। ऐसे में केंद्र व राज्य सरकार बिना देर किए नक्सलियों का फन कुचलकर शहीद जवानों का बदला ले। ऐसा इसलिए कि नक्सलियों का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है।

यह चिंता का विषय है कि बस्तर के घने जंगलों में पिछले चार दशक से नक्सली अपनी जड़ जमाए हुए हैं और उन्हें अभी तक खत्म नहीं किया जा सका है। अक्सर देखा जाता है कि मार्च-अप्रैल का महीना आते ही नक्सली सक्रिय हो जाते हैं। यह तथ्य सामने आ चुका है कि कच्ची-पक्की सड़कों के निर्माण के समय ही नक्सली इसमें बारुद बिछा देते हैं और जब इधर से जवानों की गाड़ियां गुजरती हैं वे इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस से विस्फोट कर देते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। सवाल लाजिमी है कि आखिर नक्सलियों को इतने बड़े पैमाने पर बारुद कौन उपलब्ध करा रहा है। विडंबना यह कि एक ओर नक्सली जमात सरकार से शांति वार्ता का प्रस्ताव दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर उग्रवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं।

आंकड़ों पर गौर करें तो विगत पांच वर्षों में नक्सली हिंसा की लगभग 6000 घटनाएं हुई हैं जिसमें 1250 नागरिक और तकरीबन 550 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए हैं। हां, यह सही है कि जवानों की सतर्कता के कारण पिछले कुछ समय से नक्सलियों पर नकेल कसा है और उनकी आक्रामकता कुंद हुई है। पिछले कई मुठभेड़ों के दौरान वे भारी संख्या में मारे गए हैं और उनका हौसला टूटा है। जवानों की सतर्कता के कारण छत्तीसगढ़ को छोड़ नक्सल प्रभावित 10 राज्यों में नक्सली घटनाओं में कमी आयी है।

नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई में तकरीबन डेढ़ दर्जन से अधिक शीर्ष नक्सली मारे जा चुके हैं। गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में इस साल नक्सली हिंसा की एक भी घटना नहीं हुई। इसी तरह बिहार में भी कम हिंसक घटनाएं दर्ज हुई हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाबलों को सफलता मिल रही है जिससे घबड़ाकर वे आक्रामक दिखने की कोशिश कर रहे हैं। दो राय नहीं कि जवानों की सतर्कता के कारण नक्सली घटनाओं में कमी आयी है लेकिन देश के कई राज्यों में नक्सली अभी भी अपहरण और फिरौती जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

वे फिरौती और अपहरण के पैसे से घातक हथियार खरीद रहे हैं। वे झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्राकृतिक संसाधनों वाले राज्यों में काम करने वाली कंपनियों से रंगदारी वसूल रहे हैं। यही नहीं वे इन क्षेत्रों में चलने वाली केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का एक बड़ा हिस्सा भी हड़प रहे हैं। नक्सल प्रभावित जनता नक्सलियों की जबरन वसूली से तंग आ चुकी है। अब जब सरकार द्वारा हाशिए पर पड़े लोगों को रोजगार कार्यक्रमों के जरिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम किया जा रहा है तो वे नहीं चाहते हैं कि उनका निवाला नक्सली डकारें।

दरअसल नक्सली एक खास रणनीति के तहत सरकारी योजनाओं में बाधा डाल रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि ग्रामीण जनता का रोजगारपरक सरकारी कार्यक्रमों पर भरोसा बढ़े। उन्हें डर है कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं फलीभूत हुई तो आदिवासी नौजवानों को रोजगार मिलेगा और वे नक्सली संगठनों का हिस्सा नहीं बनेंगे। यही वजह है कि नक्सली समूह सरकारी योजनाओं में रोड़ा डाल बेरोजगार आदिवासी नवयुवकों को अपने पाले में लाने के लिए किस्म-किस्म के लालच परोस रहे हैं।

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