भूमि, श्रम, पूंजी, संगठन और साहस, आर्थिक तंत्र में ये पांच चीजें किसी वस्तु या सेवा के उत्पादन के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इनके बिना न कारखाना चल सकता है और न ही सेवा क्षेत्र में कोई बड़ा संगठन आकार ले सकता है। जिन देशों एवं राज्यों ने तेजी से आर्थिक प्रगति की है उनमें श्रमिकों की भूमिका निर्विवाद रूप से सबसे महत्वपूर्ण रही है। यही कारण है कि हर जगह प्रतिभा और श्रम का सम्मान किया जाता रहा है।
कोरोना संकट के कारण लंबे समय से लॉकडाउन लागू है और इससे प्रवासी श्रमिकों को विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ा है। राज्यों ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय प्रवासी श्रमिकों को उनके सहारे छोड़ने का अपराध किया है। इससे वे करोड़ों प्रवासी श्रमिक ठगा हुआ महसूस करते हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और पसीने के दमपर शहरों की चमक-दमक को निखारने और उनकी प्रगति को बुलंदियों पर पहुंचाने का काम किया।
दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में उत्तर भारत के श्रमिक बहुत कष्टप्रद एवं अमानवीय स्थितियों में रहते हैं और दिन-रात काम करके जो कुछ कमाते हैं उसका बड़ा हिस्सा वहीं पर खर्च भी करते हैं। जिससे इन राज्यों को टैक्स के रूप में बड़ा फायदा होता है। कुल मिलाकर एक श्रमिक जिस राज्य में काम करता है, वहां दो टाइम का खाना और कुछ हजार रुपयों के सिवा कुछ खास नहीं पाता है। अधिकांश श्रमिक तय मजदूरी से कम पर निर्धारित घंटों से अधिक काम करते हैं।
ज्यादातर श्रमिकों को सामान्य सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, बीमा और चिकित्सा सुविधा भी हासिल नहीं होती है। फिर भी खोली, चाल और जे.जे. कालोनी जैसी चिन्हित अवैध बस्तियों में रहकर मेहनत करते हैं और उस राज्य के कारखानों के साथ अर्थिक तंत्र को भी चलाते हैं। महामारी के कारण जब लॉकडाउन घोषित किया गया तो काम भी बंद हो गये और इन श्रमिकों को भुखमरी जैसी स्थितियों से गुजरना पड़ा।
पंजाब, दिल्ली, मुंबई में कार्यरत अधिकांश श्रमिकों को वहां की सरकारों से कोई खास मदद नहीं मिली। भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके श्रमिक भूखे-प्यासे अपने घर को पैदल ही चल दिये, तो रास्ते में इनको लाठियां मिलीं, कुछ ने तो पैदल चलते-चलते दम तोड़ दिया। जब ट्रेनों एवं बसों में श्रमिक घर लौटे तो कामबंदी के कारण महीनों से भूखे-प्यासे इन श्रमिकों से टिकट का पैसा भी लिया गया। घर भेजने में इसलिए आनाकानी की गयी कि राज्य में श्रमिकों की कमी हो जायेगी।
श्रमिकों के साथ हुए इस अमानवीय बर्ताव के बाद अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश के श्रमिकों को स्थानीय स्तर पर ही नियोजित करना चाहते हैं, तो यह श्रम के सम्मान, प्रदेश के स्वाभिमान व प्रगति को आगे बढ़ाने के निहायत जरूरी कदम है। अब तक जितने भी अध्ययन हुए हैं उसमें इस बात की पुष्टि हुई है कि श्रमिक पलायन कर जहां जाते हैं उस राज्य या देश का विकास होता है और जहां से पलायन होता है उसे नुकसान होता है।
प्रदेश सरकार ने प्रवासी आयोग बनाकर घर लौटे श्रमिकों को रोजगार देने का जो संकल्प जताया है वह सामयिक कदम है। इन श्रमिकों का डेटा तैयार कर उनको रोजगार से जोड़ा जाता है, उनके कौशल का उपयोग किया जाता है तो निश्चित रूप से प्रदेश का विकास तेज होगा और एमएसएमई, ओडीपीओ जैसी योजनाओं को कुशल श्रमिक मिलने से बहुत फायदा होगा।





