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कश्मीरी पंडितों के पलायन को दर्शाती है मानव कौल की ‘बारामूला’

साल 2016 में सेट यह कहानी रोचक है
लखनऊ। कश्मीर की वादी जितनी हसीन है, अपने दामन में उसने उतने ही जख्म भी समेटे हुए हैं। फिर वो आतंकवाद का साया हो, मासूम बच्चों का पत्थरबाज बनना या फिर बरसों पहले हुआ कश्मीरी पंडितों का पलायन। ‘बारामूला’ कश्मीर के इन्हीं जख्मों पर मरहम लगाती एक संवेदनशील फिल्म है। कश्मीर पर ही ‘आर्टिकल 370’ बनाने वाले निमार्ता आदित्य धर और निर्देशक आदित्य सुहास जांबले की जोड़ी की यह सुपरनैचरल क्राइम थ्रिलर, घाटी में बच्चों का ब्रेनवॉश करके आतंक के रास्ते पर धकेलने के मुद्दे से शुरू होकर 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई ज्यादती से जुड़ती है। कहानी बारामूला में एक पूर्व एमएलए के मासूम बेटे के गायब होने से शुरू होती है। केस सुलझाने के लिए डीएसपी रिदवान सैय्यद शफी (मानव कौल) अपनी पत्नी गुलनार (भाषा सुंबली), बेटी नूरी (अरिस्ता मेहता) और बेटे अयान (रोहान सिंह) के साथ बारामूला पहुंचता है। रिदवान केस की पड़ताल कर ही रहा होता है कि वहां कई और स्कूली बच्चे दिन-दहाड़े गायब हो जाते हैं। इधर, जिस घर में रिदवान और उसका परिवार रहता है, वहां गुलनार और उसके बच्चों को अजीबोगरीब साए दिखाई देते हैं। आवाजें सुनाई देती हैं, जिस पर रिदवान भरोसा नहीं करता। कहानी में आगे हमें पता चलता है कि रिदवान के हाथों पहले एक ऐसा हादसा भी हो चुका है, जिसकी वजह से उनकी बेटी संग ही उसके रिश्ते सामान्य नहीं है। अब दिखाई देने वाले ये साएं कौन हैं? बच्चों के गायब होने से उनका क्या कनेक्शन है? यह सब आपको फिल्म देखकर पता चलेगा। साल 2016 में सेट यह कहानी रोचक है, मगर धीमे-धीमे खुलती है। निर्देशक और को-राइटर आदित्य जांबले, शहर और रिदवान के घर में घट रहे घटनाक्रमों को स्थापित करने में काफी समय लेते हैं। इसके चलते स्क्रीनप्ले शुरू में जटिल लगता है, लेकिन जैसे-जैसे घर के सायों का रहस्य खुलता है, अतीत और वर्तमान के सारे तार जुड़ने शुरू होते हैं, तो यह आपको हैरान और भावुक दोनों करता है। फिल्म के क्लाइमैक्स की चर्चा विशेष रूप से बनती है। यह आखिरी आधा घंटा बेहद असरदार है। यह आपको झकझोकरता है और इसका बड़ा श्रेय डीओपी अर्नाल्ड फर्नांडिस और एडिटर शिवकुमार वी पणिक्कर को भी जाता है। अर्नाल्ड की सिनेमेटोग्राफी और शिवकुमार की एडिटिंग लाजवाब है। बारामूला के प्रतीक सफेद ट्यूलिप और धर्म के नाम पर खोते बचपन के मेटाफर भी बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल किए गए हैं। एक्टिंग की बात करें, तो सभी कलाकारों ने नैचरल एक्टिंग की है। मानव कौल, भाषा सुंबली और बच्चे, सभी ने अपने किरदारों को सच्चाई बख्शी है। कुल मिलाकर, कुछ हटकर देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है, मगर निर्देशक हर चीज सरल करके नहीं समझाते, इसलिए अगर ध्यान भटका तो आप कुछ चीजें मिस कर सकते हैं।

ऐक्टर:मानव कौल,भाषा सुंबली,अरिस्ता मेहता,रोहान सिंह,मीर सरवर
डायरेक्टर :आदित्य सुहास जांबले
रेटिंग-2.5/5

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