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लखनऊ का ऐतिहासिक याहियागंज गुरुद्वारा जरूरतमंदों के लिए वरदान

नौवें गुरु तेग बहादुर जी महाराज 1670 में आए थे
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यह गुरुद्वारा यहियागंज में स्थित है, जहां सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी महाराज 1670 में आए थे और महाराज तीन दिन इसी स्थान पर रुके थे। इसके अलावा, गुरु गोविंद सिंह जी महाराज 1672 में यहां दो महीने से अधिक रुके थे। यह स्थान अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। साथ ही यह स्थान भूखे लोगों का सहारा भी है, यहां सभी धर्म के व्यक्ति लंगर का प्रसाद खाकर अपना पेट भरते हैं। गुरुद्वारे सचिव मनमोहन सिंह ने बताया कि इस स्थान पर गुरु महाराज की कृपा से एक प्रथा शुरू हुई है। गुरुनानक तेग जी महाराज ने 20 रुपए का लंगर चलाया था और तब से यह प्रथा शुरू हुई। इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य था कि कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे, क्योंकि रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की तीन महत्वपूर्ण जरूरतें होती है। कपड़ा और मकान किसी तरह उपलब्ध हो सकते हैं, लेकिन रोटी के बिना कोई नहीं रह सकता। इसलिए गुरुनानक तेग जी महाराज ने इस पहली जरूरत को पूरा करने के लिए लंगर की प्रथा को स्थापित किया, ताकि एक विशेष धर्म का व्यक्ति ही लंगर को प्राप्त न करें, बल्कि सभी धर्म के लोग लंगर खा सके।

परोसा जाता है स्वादिष्ट भोजन:
मनमोहन सिंह ने बताया कि गुरुद्वारे में हर रविवार को सुबह से दीवान सजाया जाता है और 12:30 बजे से लंगर शुरू होता है, जो शाम 4 बजे तक चलता है। इसके अलावा, शनिवार को शाम को यहां लंगर लगता है और गुरुवार को भी शाम में लंगर सेवा की जाती है। इस लंगर की सेवा को बड़े अच्छे स्तर पर प्रबंधित किया जाता है। लंगर में दाल चावल और अनुमन पनीर की कोई सब्जी होती है और रोटी हाइजीनिक तरीके से मशीनों में बनाई जाती है। एक घंटे में हजारों रोटी आराम से बन जाती है।

सेवा का मौका खोजते रहते हैं सेवादार:
यहां सेवादार हमेशा उपस्थित रहते हैं और सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। गुरुद्वारे में हर व्यक्ति को सेवा करने का मौका मिलता है, चाहे वह साफ-सफाई करने में हो या भोजन करवाने में, लोग अपनी श्रद्धा और इच्छा के साथ सभी की सेवा करते हैं। लंगर में भोजन करने के बाद प्रसाद में कोल्ड्रिंक भी प्रदान की जाती है।

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