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बिना व्यवधान सदन चलाने के कानून व नियम बनें : ओम बिरला

लखनऊ। कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन (सीपीए) के भारत क्षेत्र का सम्मेलन गुरुवार को यहां शुरू हो गया। विधानसभा मंडप में दीप प्रज्ज्वलित कर सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि सदन लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर होता है। बिना व्यवधान सदन चले, इसके लिए हमें कानून और नियम बनाने चाहिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश की अहम भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि इस राज्य से अनेक उम्मीदें हैं। अत: यूपी संसदीय परंपराओं का नया इतिहास रचे। देश का मार्गदर्शन करे, वंचितों-शोषितों और गरीबों के जीवन को बेहतर करने के लिए काम किया जाए। बिरला ने संसदीय परंपराओं को उच्च कोटि का बनाने पर जोर दिया।

बिरला ने पीठासीन अधिकारियों के अधिकार बढ़ाने पर भी जोर दिया। कहा कि सीपीए में 57 देश शामिल हैं। पर इनमें भारत का अलग ही महत्व है। भारत में विविधता में एकता का जो संगम दृष्टिगोचर होता है, वह अद्भुत है। अब तो अनेक देश संसदीय परंपराओं को बेहतर बनाने पर बल दे रहे हैं। हमें उनका भरपूर साथ देना चाहिए। बिरला ने कहा कि उत्तर प्रदेश ने तो भारत के संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने का ही काम किया है। लोकतंत्र हमारे राष्ट्र की आत्मा है। भारत पूरे विश्व का नेतृत्व कर रहा है। हम धार्मिक, सामाजिक, न्याय पक्षधर हैं, इसीलिए जनता का लोकतंत्र में विश्वास बढ़ा है। हमें जनता के विश्वास पर खरे उतरना होगा। गरीबों को ऊपर उठाना होगा। भारत में अलग-अलग जाति, धर्म और बोली के बाद भी विविधता में एकता है तो इसीलिए कि हम सबको विश्वास में लेकर चलते हैं।

सदन की कार्यवाही के संबंध में उनका कहना था कि व्यावहारिक नियमों और परंपराओं से सदन चलाना चाहिए। इसमें वाक स्वतंत्रता होती है, सहमति तथा असहमति भी होती है लेकिन इसके बाद भी लोकतांत्रिक परंपराओं को ऊंचा किया गया है। बिरला ने आह्वान किया कि सदस्य संयम और अनुशासन के साथ अपनी बात रखें। कहा कि जनप्रतिनिधि सरकार और जनता के बीच सेतु तो होता ही है, वह नीति निर्धारण में भी अहम भूमिका निभाता है। इसलिए संसद तथा विधान मंडल को जनता का विश्वास जीतना होगा। चुनावों में लगातार बढ़ रहा मत प्रतिशत बताता है कि लोगों का लोकतंत्र में विश्वास बढ़ा है। भारत का संविधान लोकतंत्र का रक्षक है।

उन्होंने कहा कि विधान मंडल का दायित्व है कि वह सरकार पर नियंत्रण रखने के साथ ही उसकी नीतियों के क्रियान्वयन की निगरानी भी करे। इसमें संसदीय समितियों की भूमिका अहम होती है। संसाधनों को, बजट को अंतिम पायदान तक कैसे पहुंचाएं, इसकी निरंतर समीक्षा होनी चाहिए।

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